वो मुअज़्ज़िन था
ज़रा सी देर को आ या था अपने घर
ये कहने को
कि कोई शोर हो दस्तक हो
दरवाज़ा न खोलोगी
दरीचे बंद रक्खोगी
हवाएँ शहर की बदली हुई हैं
यही ताकीद कर के वो वापस हो गया था
और अपनी कोठरी में बंद
उस की काँपती बीवी
कलेजे से लगाए नन्हे बच्चों को
किसी सहमी हुई चिड़िया की सूरत
पर समेटे दम-ब-ख़ुद बैठी रही
न जाने रात के कितने पहर बीते
फज्र होने को आई
बशारत बाँग की सूरत
किसी मुर्ग़े ने दी थी सुब्ह होने की
मगर मस्जिद के मिम्बर से
बिला-नाग़ा बुलंद होती
मोअज़्ज़िन की सदा चुप थी
अज़ान-ए-सुब्ह ग़ाएब थी
— Kahkashan Tabassum















