"सुख का हुसूल"
सुख का हुसूल
और दुख से नजात
सिर्फ़ दो ही तो मसअले नहीं हैं ज़िंदगी के
सुख और दुख के बीच भी तो मसअले हैं
ज़िंदगी को जितना सोचोगे
उतना उलझाएगी
मैं आज तक ख़ुद को नहीं समझ सका
फिर ज़िंदगी
धूप छाँव का खेल है
जिस पर सूरज का इख़्तियार है
अपना नहीं
— Javed Nadeem















