"काएनात एक अज़ीम सदाक़त है"

काएनात एक अज़ीम सदाक़त है
सरापा मगर तह-दर-तह सदाक़त
काएनात की ये सदाक़तें
आदमी पर ब-तदरीज ज़ाहिर होती हैं
कि आदमी सदाक़त-ए-कामिला के इदराक का ब-यक-वक़्त मुतहम्मिल नहीं
एक सदाक़त के बा'द दूसरी का इरफ़ान पहली को बातिल नहीं करता
दिन का उजाला रात के अंधेरे का मुनकिर नहीं है
पतझड़ की बे-रौनक़ी आने वाले मौसम की शादाबी का मुज़्दा है
मौत हमेशा ही ज़िंदगी की हम-सफ़र रही है
काश
हम इस नुक्ते को समझ सकते

— Javed Nadeem

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