मुतमइन नफ़स की आरज़ू में
जो भी निकला वो वापस न आया
रूह की वहशतों में उलझ कर
मुतमइन नफ़स की आरज़ू में
जो भी निकला वो वापस न आया
लोग फिर देखते क्यूँ नहीं हैं
लोग फिर सोचते क्यूँ नहीं हैं
लोग फिर बोलते क्यूँ नहीं हैं
— Iftikhar Arif
जो भी निकला वो वापस न आया
रूह की वहशतों में उलझ कर
मुतमइन नफ़स की आरज़ू में
जो भी निकला वो वापस न आया
लोग फिर देखते क्यूँ नहीं हैं
लोग फिर सोचते क्यूँ नहीं हैं
लोग फिर बोलते क्यूँ नहीं हैं
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