मैं लाख बुज़दिल सही मगर मैं उसी क़बीले का आदमी हूँ कि जिस के बेटों ने

जो कहा उस पे जान दे दी
मैं जानता था मिरे क़बीले की ख़ेमा-गाहें जलाई जाएँगी और तमाशाई
रक़्स-ए-शोला-फ़िशाँ पर इसरार ही करेंगे
मैं जानता था मिरा क़बीला बुरीदा और बे-रिदा सरों की गवाहियाँ
ले के आएगा फिर भी लोग इनकार ही करेंगे
सो मैं कमीं-गाह-ए-आफ़ियत में चला गया था
सो मैं अमाँ-गाह-ए-मस्लहत में चला गया था
और अब मुझे मेरे शह-सवारों का ख़ून आवाज़ दे रहा है
तो नज़्र-ए-सर ले के आ गया हूँ
तबाह होने को एक घर ले के आ गया हूँ
मैं लाख बुज़दिल सही मगर मैं उसी क़बीले का आदमी हूँ!

— Iftikhar Arif

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