अभी कुछ दिन लगेंगे

दिल ऐसे शहर के पामाल हो जाने का मंज़र भूलने में
अभी कुछ दिन लगेंगे
जहान-ए-रंग के सारे ख़स-ओ-ख़ाशाक सब सर्व-ओ-सनोबर भूलने में अभी कुछ दिन लगेंगे
थके हारे हुए ख़्वाबों के साहिल पर कहीं उम्मीद का छोटा सा इक घर
बनते बनते रह गया है
वो इक घर भूलने में अभी कुछ दिन लगेंगे
मगर अब दिन भी कितने रह गए हैं
बस इक दिन दिल की लौह-ए-मुंतज़िर पर
आचानक
रात उतरेगी
मिरी बे-नूर आँखों के ख़ज़ाने में छुपे हर ख़्वाब की तकमील कर देगी
मुझे भी ख़्वाब में तब्दील कर देगी
इक ऐसा ख़्वाब जस का देखना मुमकिन नहीं था
इक ऐसा ख़्वाब जिस के दामन-ए-सद-चाक में कोई मुबारक कोई रौशन दिन नहीं था
अभी कुछ दिन लगेंगे

— Iftikhar Arif

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