उस ने दो चार कर दिया मुझ को

ज़ेहनी बीमार कर दिया मुझ को

क्यूँ नहीं दस्तरस में तू मेरे
क्यूँ तलबगार कर दिया मुझ को

कभी पत्थर कभी ख़ुदा उस ने
चाहा जो यार कर दिया मुझ को

उस से कोई सवाल मत करना
उस ने इनकार कर दिया मुझ को

एक इंसान ही तो माँगा था
उस को भी मार कर दिया मुझ को

— Himanshi babra KATIB

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