आज बादल ख़ूब बरसा और बरस कर खुल गया

गुल्सिताँ की डाली डाली पत्ता पत्ता धुल गया
देखना क्या धुल गया सारे का सारा आसमाँ
ऊदा ऊदा नीला नीला प्यारा प्यारा आसमाँ
हट गया बादल का पर्दा मिल गई किरनों को राह
सल्तनत पर अपनी फिर ख़ुर्शीद ने डाली निगाह
धूप में है घास पर पानी के क़तरों की चमक
मात है इस वक़्त मोती और हीरे की दमक
दे रही है लुत्फ़ क्या सरसब्ज़ पेड़ों की क़तार
और हरी शाख़ों पे है रंगीन फूलों की बहार
क्या परिंदे फिर रहे हैं चहचहाते हर तरफ़
रागनी बरसात की ख़ुश हो के गाते हर तरफ़
देखना वो क्या अचम्भा है अरे वो देखना
आसमाँ पर इन दरख़्तों से परे वो देखना
ये कोई जादू है या सच-मुच है इक रंगीं कमाँ
वाह वा कैसा भला लगता है ये प्यारा समाँ
किस मुसव्विर ने भरे हैं रंग ऐसे ख़ुशनुमा
इस का हर इक रंग है आँखों में जैसे खुब गया
इक जगह कैसे इकट्ठे कर दिए हैं सात रंग
शोख़ हैं सातों के सातों इक नहीं है मात रंग
है ये क़ुदरत का नज़ारा और क्या कहिए इसे
बस यही जी चाहता है देखते रहिए इसे
नन्हे नन्हे जम्अ'' थे पानी के कुछ क़तरे वहाँ
उन पे डाला अक्स सूरज ने बना दी ये कमाँ
देखो देखो अब मिटी जाती है वो प्यारी धनक
देखते ही देखते गुम हो गई सारी धनक
फिर हवा में मिल गई वो सब की सब कुछ भी नहीं
आँखें मल मल कर न देखो आओ अब कुछ भी नहीं

— Hafeez Jalandhari

More by Hafeez Jalandhari

Other nazm from the same pen

See all from Hafeez Jalandhari →

Garmi Shayari

Shers of garmi.

All Garmi Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling