तू कि ना-वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-शहंशाही थी

रक़्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है
तुझ को इनकार की जुरअत जो हुई तो क्यूँकर
साया-ए-शाह में इस तरह जिया जाता है

अहल-ए-सर्वत की ये तज्वीज़ है सरकश लड़की
तुझ को दरबार में कोड़ों से नचाया जाए
नाचते नाचते हो जाए जो पायल ख़ामोश
फिर न ता-ज़ीस्त तुझे होश में लाया जाए

लोग इस मंज़र-ए-जांकाह को जब देखेंगे
और बढ़ जाएगा कुछ सतवत-ए-शाही का जलाल
तेरे अंजाम से हर शख़्स को इबरत होगी
सर उठाने का रेआया को न आएगा ख़याल

तब्-ए-शाहाना पे जो लोग गिराँ होते हैं
हाँ उन्हें ज़हर भरा जाम दिया जाता है
तू कि ना-वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-शहंशाही थी
रक़्स ज़ंजीर पहन कर भी किया जाता है

— Habib Jalib

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