हरियाली को आँखें तरसें बगिया लहू-लुहान

प्यार के गीत सुनाऊँ किस को शहर हुए वीरान
बगिया लहू-लुहान

डसती हैं सूरज की किरनें चाँद जलाए जान
पग पग मौत के गहरे साए जीवन मौत समान
चारों ओर हवा फिरती है ले के तीर कमान
बगिया लहू-लुहान

छलनी हैं कलियों के सीने ख़ून में लत-पत पात
और न जाने कब तक होगी अश्कों की बरसात
दुनिया वालो कब बीतेंगे दुख के ये दिन-रात
ख़ून से होली खेल रहे हैं धरती के बलवान
बगिया लहू-लुहान

— Habib Jalib

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