वो पुल की सातवीं सीढ़ी पे बैठा कहता रहता था
किसी थैले में भर के गर ख़याल अपने
मैं दरवाज़े पे हरकारे की सूरत जा के पहुँचाता
चमकती बूँदें बारिश की किसी की जेब में भर के
गले में बादलों का एक मफ़लर डाल कर आता
वो भीगा भीगा सा रहता
किसी के कान में दो बालियों से चाँद पहनाता
मछेरों की कोई लड़की अगर मिलती
गरजते बादलों को बाँध कर बालों के जोड़े में
धनक की बीनी दे आता
मुझे गर कहकशाँ को बाँटने का हक़ दिया होता ख़ुदा ने तो
कोई फ़ुटपाथ से बोला
ऐ औलाद शाइ'र की
बहुत खाई हैं रूखी रोटियाँ मैं ने
जो ला सकता है तो इक बार कुछ सालन ही ला कर दे
— Gulzar















