वो बशर जो पढ़ के भी कहता हो यूँँ

बन के तालिब और कुछ हासिल करूँ
कोई शक उस की फ़ज़ीलत में नहीं
उस का रुत्बा है फ़रिश्तों से फ़ुज़ूँ
वो बशर कुछ भी न आता हो जिसे
लेकिन उस को शौक़ हो आलिम बनूँ
अपनी बे-इल्मी का उस को इल्म है
ना-मुनासिब है उसे जाहिल गिनूँ
वो बशर जो हो निरा अहमक़ मगर
ख़ुद समझता हो कि दानिश-मंद हूँ
मौत है उस की हिमाक़त का इलाज
वो रहेगा उम्र भर ख़्वार-ओ-ज़बूँ
हर बशर ऐ 'फ़ैज़' ये कोशिश करे
जिस तरह भी हो जहालत से बचूँ

— Faiz Ludhianvi

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