ख़्वाब चुनती हुई आँखें हैं परिंदों की तरह
और ये जिस्म कि जैसे कोई बे-बर्ग शजर
ग़ैर-वाज़ेह सा तसव्वुर कोई मुबहम सा ख़याल
किस तरह रात की दहलीज़ कोई पार करे
— Faisal Hashmi
और ये जिस्म कि जैसे कोई बे-बर्ग शजर
ग़ैर-वाज़ेह सा तसव्वुर कोई मुबहम सा ख़याल
किस तरह रात की दहलीज़ कोई पार करे
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