कितने बख़्त वाले हो

ज़िंदगी में जो चाहा
तुम ने पा लिया आख़िर
अज़्म और हिम्मत से
फ़ह्म से ज़कावत से
है तुम्हारे दामन में
फूल कामरानी का
और तुम्हारे माथे पर
फ़ख़्र का सितारा है
अब तुम्हारे चेहरे पर
ऐसी शादमानी है
कोई कह नहीं सकता
दर्द से भी वाक़िफ़ हो
और तुम्हारे पाँव में
देर से खटकता है
आरज़ू का इक काँटा
जिस से ख़ून रिसता है
लाला-ज़ार राहों पर
इस लहू की सुर्ख़ी की
काँपती लकीरें हैं
इन लहू के धब्बों में
ना-तमाम मुबहम सी
एक बात लिखी है

— Fahmida Riaz

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