सहर के वक़्त

कुँवारी ज़मीन शबनम में नहा के लेटी है
वो सब्ज़ चादर-ए-गुल-ताब
आरिज़-ए-महताब
ख़ुमार-ए-ख़्वाब का आलम
वो इंतिज़ार का आलम
कि दूर देस से जैसे
कभी तो आएगा
वो दूर देस से सूरज का देवता आया
और अपनी तेज़ निगाहों से गुदगुदी करता
वो जौफ़-उल-अर्ज़ के निस्फ़ुन्नहार पर पहुँचा
ज़मीं पे ख़ौफ़ की इक ज़र्द लहर सी फैली
मगर वो सब्ज़ सा जादू कुँवारी दुल्हन का
फ़ज़ा पे छा ही गया इक ख़ुमार का आलम
उतर गया हरे शीशे में देवता आख़िर

वो शाम लम्स धुँदलका
लबों का रंग लबों में घुला
हसीन था मंज़र
लज़ीज़ था लम्हा
हवा की अँगड़ाई

और उस के बा'द भयानक हवा के ज़न्नाटे

— Ejaz Farooqi

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