धूप कितनी ख़ूब-सूरत है यहाँ
हसीं चेहरों पर धूप
ताज-महल पर धूप
हुस्न ख़ुद चल कर यहाँ
हुस्न को देखने आता है
मैं चलते-फिरते हुस्न में
ऐसा खोया हूँ
कि कुछ समझ में नहीं आता
ताज को देखूँ या हुस्न-ए-गुरेज़ाँ को
— Ehtisham Akhtar
हसीं चेहरों पर धूप
ताज-महल पर धूप
हुस्न ख़ुद चल कर यहाँ
हुस्न को देखने आता है
मैं चलते-फिरते हुस्न में
ऐसा खोया हूँ
कि कुछ समझ में नहीं आता
ताज को देखूँ या हुस्न-ए-गुरेज़ाँ को
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