सहर के अगर ऐसे लम्हात में जागते हो

सितारे भी जब ऊँघ जाएँ
अगर दूधिया चाँदनी के जवाँ जिस्म की मौत देखे हुए हो
अगर सोच में सर खुजाते दरख़्तों की
वीराँ पुर-असरार तन्हाइयों बीच
पिछले सितारे की छाँव तले
गाम दो गाम
सोई हुई साअ'तों में
चले हो
तो तुम हम से हो
तुम मगर तब कहाँ थे
सिधारत ने जब आख़िरी रात में
दो सितारों के माथों पे बोसा दिया
और आफ़ाक़ में खो गया
दूर सदियों की पहनाई पर
मैं जो हैराँ खड़ा देखता था
अकेला कई क़र्न रोता रहा हूँ

— Ehsan Akbar

More by Ehsan Akbar

Other nazm from the same pen

See all from Ehsan Akbar →

Khudkushi Shayari

Shers of khudkushi.

All Khudkushi Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling