रहगुज़र पर शोर-ओ-ग़ुल का सैल है
बह रहा है ख़ुश्क तिनके की तरह
ये जहान-ए-रंग-ओ-बू
घूमते पहियों धड़कती गाड़ियों की हिचकियाँ
दास्ताँ-दर-दास्ताँ उलझी हुई हैं चार-सू
दर्द से सह
में हुए ख़्वाबों के लाखों क़ाफ़िले
गामज़न हैं सू-ए-हसरत हौसले था
में हुए
मैं भी उन में तुम भी इन में सारी दुनिया उन में है
ख़ामुशी भी नग़्मगी भी अश्क-ओ-ख़ूँ भी उन में है
कुछ निगाहें अर्श पर हैं कुछ निगाहें फ़र्श पर
वक़्त आँधी की तरह
कर रहा है तेज़-तर इस सैल को
हम कहाँ हैं कौन सी मंज़िल पे हैं
कोई बतलाओ कोई आवाज़ दो
कोई बतलाओ कोई आवाज़ दो
— Balraj Komal















