जब सर-ए-शाम पजीराई-ए-फ़न होती हैशाहज़ादी को कनीज़ों से जलन होती हैले तो आया हूँ तुझे घेर के अपनी जानिबआगे इंसान की अपनी भी लगन होती है— Azhar Faragh