"नज़्म क्या है"
शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल
उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल
नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी
ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी
नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ
और आज़ाद में भी है इस का निशाँ
नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़
इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़
नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है
वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है
वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए
नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे
वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो
इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो
मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया
नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता
नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का
एक दरिया सा है देखो जज़्बात का
वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई
ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की
वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो
दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो
'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह
हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह
नज़्म में जो कहानी कही जाएगी
शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी
नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं
जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं
करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ
नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा















