"अभी ये सिर्फ़ लड़के हैं"

अभी ये सिर्फ़ लड़के हैं
अभी दुनिया इन्हें आसान लगती है
इन्हें आवारगी इक मर्द की पहचान लगती है
अभी ये चाहते हैं भीड़ से इन को जुदा मानें
कोई अच्छा कहे इन को
इन्हें अच्छा नहीं लगता
ये सिगरेट पी रहे हैं यूँ कि सब इन को बुरा जानें
अभी ये जागती रातें कहाँ इन को थकन से चूर करती हैं
अभी रुसवाइयाँ इन को बहुत मसरूर करती हैं
अभी इन को ये लगता है कि इक ठोकर से पत्थर तोड़ सकते हैं
अभी इक फ़िल्म की ख़ातिर ये पेपर छोड़ सकते हैं
हो कोई सानेहा लेकिन ये आँखें नम नहीं करते
ये लड़के फ़ेल हो जाएँ तो बिल्कुल ग़म नहीं करते
इन्हें ये ख़ुश-गुमानी है
कि इन के शोर-ओ-गुल से सोए इंसाँ जाग जाएँगे
ये ख़ालिस इश्क़ करते हैं
बिना सोचे हुए हालात क्या हैं उन के वो क्या हैं
इन्हें शादी की सब बारीकियाँ बेकार लगती हैं
ये लड़के सोचते हैं
अगर शादी न कर पाए
तो महबूबा को ले कर भाग जाएँगे
अभी कब इल्म है इन को
कि हर छोड़ा हुआ पेपर
जब इन की उम्र बन कर सामने आएगा क्या होगा
अभी कब इल्म है इन को
कि तब कैसा लगेगा
कि जब ये लड़कियाँ इक दिन
किसी की बीवी हो कर मिलने आएँगी
मुहब्बत और हिक़ारत से इन्हें बुज़दिल बताएँगी
ख़याल आएगा इन को काश हम अब जितने बुज़दिल हैं
अगर उस वक़्त भी होते तो बेहतर था
वो रातें जाग कर काटा गया जिन को
कभी सड़कों कभी चाय के ढाबों पर
अगर उन सारी रातों में
किसी कमरे में पड़ कर शाम से सोते तो बेहतर था

— Ameer Imam

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