ग़ुलाम तुम भी थे यारों ग़ुलाम हम भी थे
नहा के ख़ून में आई थी फ़स्ले-आज़ादी
मज़ा तो तब था कि जब मिल कर
इलाज-ए-जां करते
ख़ुद अपने हाथ से
तामीर-ए-गुलसितां करते
हमारे दर्द में तुम
और तुम्हारे दर्द में हम शरीक़ होते
तो जश्न-ए-आशियां करते
तुम आओ गुलशन-ए-लाहौर से चमन बर्दोश
हम आएँ सुब्ह-ए-बनारस की रौशनी ले कर
हिमालय की हवाओं की ताज़गी ले कर
और उस के बा'द ये पूछें
कौन दुश्मन है ?
— Ali Sardar Jafri















