नुज़ूल-ए-इताब की घड़ी

नज़दीक है……
दरबारी कुत्ते!
रू-पोश बाग़ियों की तलाश में
ज़मीनें सूँघते फिर रहे हैं
सरबराहों की क़ुव्वत-ए-फ़ैसला जवाब दे चुकी है
उन के मफ़्लूज हाथ
दरबारियों के रचाए षड़यंत्रों पर
क्यूँ दस्तख़त करने की मशीनें हैं
उन की ज़बानें सिर्फ़ धमकियाँ बोलती हैं
उन के अना-परस्त कान
गिड़गिढ़ाहटें सुनने के आदी हो चुके हैं
मुशीरों और सलाह-कारों का दावा है
कि वो जल्द ही सरबराहों को
दस्त-ख़तों की ज़हमत से भी नजात दिलाने का रास्ता ढूँड निकालेंगे!

— Aashufta Changezi

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