नहीं मिटती
किसी की भूक
रोटी से
नहीं करते
किसी के दर्द का दरमाँ
आँसू
कहीं होता असर
दी हुई दु'आओं का
नहीं उठता
कोई इंक़लाब
लहू से
नहीं उगता
कोई सब्ज़ा
पसीने से
फलता ही नहीं
कोई भी काम
बाँधा ही नहीं गया
प्रेम सूत
हमारी 'उम्रें गुज़र चुकी हैं
— Aadil Raza Mansoori















