पलट कर देख भर सकती हैं
भेड़ें
बोलना चाहें भी तो बोलेंगी कैसे
हो चुकी हैं सल्ब आवाज़ें कभी की
लौटना मुमकिन नहीं है
सिर्फ़ चलना और चलते रहना है
ख़्वाबों के ग़ार की जानिब
जिस का रस्ता
सुनहरे भेड़ियों के दाँतों से हो कर गुज़रता है
— Aadil Raza Mansoori
भेड़ें
बोलना चाहें भी तो बोलेंगी कैसे
हो चुकी हैं सल्ब आवाज़ें कभी की
लौटना मुमकिन नहीं है
सिर्फ़ चलना और चलते रहना है
ख़्वाबों के ग़ार की जानिब
जिस का रस्ता
सुनहरे भेड़ियों के दाँतों से हो कर गुज़रता है
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