
ये बात और है कभी मातम नहीं किया
लेकिन तुम्हारे हिज्र का ग़म कम नहीं किया
इक दर्द सा ही बनके मेरे साथ तू रहे
कुछ इस
लिए भी ज़ख़्मों पे मरहम नहीं किया
— Mohammad Aquib Khan
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