"अधूरा ख़्वाब"

मैं ने एक अधूरा ख़्वाब देखा, जो शायद कभी पूरा न हो सकेगा
एक रात घर में मुझे किसी की आहट हुई।

मुझे लगा, कि तुम हो

मैं तुम्हें देखने उसी बंद कमरे में गया।
ज़मीं पर तुम्हारी यादों में गुम सो गया।

उस ख़्वाब में जब तुम आईं, तो मैं ने तुम्हें बतलाया कि -
"देखो तुम्हारे जाने के बा'द दिनों तक हमारा बिस्तर नहीं सँवरा,
उस बिस्तर पे बिछी चादर की सिलवटें आज भी ज्यूँ की त्यों हैं ।

मुझे ये बिस्तर, तकिया और इस चादर की सिलवटें,
हर रात उन्हीं बीती तन्हा शबों की याद दिलाती है।
जो मैं ने और तुम ने साथ गुज़ारी थीं।
वही रातें जिन रातों में तुम इस चादर की सिलवटों की अँगड़ाई में,
और मैं तुम्हारी बाँहों में समाया था।"

मैं इस के आगे कुछ और बतला पाता और तुम्हारे क़रीब आता कि
घर के दरवाज़े की खटखट ने,
मेरी गहरी मुक़म्मल नींद को मौत में तब्दील होने से रोक लिया।।

और वो अधूरा ख़्वाब अधूरा ही रहा, फिर कभी पूरा न हो सका।

— Shivansh Singhaniya

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