काग़ज़ की कश्ती

उन रोज़ जब बचपन में
कोई पनारा बहता था
मन काग़ज़ की कश्ती बना कर
संग संग उस के रहता था

हम कश्तियाँ बना बना कर
बारिश में बहाते रहते
पनारा मिलता नाले में
नाले मिलते दरिया में
कोई कश्ती तो पहुँची होगी
हम जागे रहते दुपहरिया में

क्या ख़ूब ठिठोली होती थी
वक़्त की मीठी गोली होती थी
अभी अभी पता चला
वो ऊपर बैठा खेल रहा है
बना बना के भेज रहा है कश्तियाँ
दरिया-ए-वक़्त में बहने के लिए

कुछ गल जाएँगी
कुछ डूब जाएँगी
कुछ के गीले लुथड़े पहुँचेंगे
लमहों की लहरों में फँसकर

फिर से ख़ूब ठिठोली होगी ऊपर
काग़ज़ की कश्ती का खेल मुसलसल
वो मालिक हद-ए-वक़्त तक पहुँचाएँगे
हम उसी ठिठोली की ख़ातिर
गल गल कर बह जाएँगे.

— Prashant Beybaar

More by Prashant Beybaar

Other nazm from the same pen

See all from Prashant Beybaar →

Bachpan Shayari

Shers of bachpan.

All Bachpan Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling