ज़ख़्मों पे ज़ख़्म खाए ज़माने गुज़र गएपत्थर भी घर में आए ज़माने गुज़र गएमेरी निगाह अब भी उसी सिम्त है मगरखिड़की पे उस को आए ज़माने गुज़र गए— Navneet krishna