"तशवीश"
मुझ को ये डर है कि शायद
ये सब कुछ सच हो जाएगा
आज का दिन निकला है जैसे
यूँॅं कल का भी निकल जाएगा
फिर धीरे-धीरे क्या होगा
मेरी सालों की मेहनत पर
ये क़िस्मत पानी फेरेगी
मैं अल्हड़-पन से निकलूॅंगा
और ज़िम्मेदारी घेरेगी
कॉलेज ख़त्म हो जाएगा
फिर नौकरी करूँॅंगा मैं
और दस पंद्रह हज़ार के ख़ातिर
दिन और रात मरूॅंगा मैं
दिन दफ़्तर में जाएगा और रात ख़यालों में जाएगी
फिर इस सोच में दिन निकलेंगे अपनी बारी आएगी
मगर नहीं आएगी
इक इतवार ज़रूर आएगा
छह दिन बा'द कहीं जा कर के
एक महीने की तनख़्वाह
इक हफ़्ते में ख़त्म
फिर दूर-दूर तक नहीं दिखेंगे
नाज़ ग़ज़ल और नज़्म
शौक़ दबाता जाऊॅंगा
फ़र्ज़ निभाता जाऊॅंगा
फिर धीरे-धीरे क्या होगा
शादी की बातें होंगी
दिन दफ़्तर में जाएगा
साथ किसी के रातें होंगी
जो शाख-ए-उम्मीद पकड़ के बैठा हूँ
ये भी इक दिन जल जाएगी
फिर धीरे-धीरे क्या होगा
नाज़ जवानी ढल जाएगी
मुझ को कुछ करना था
मुझ को कुछ बनना था
मगर नहीं कर पाया मैं
बाक़ी सब तो कर लेंगे कुछ
अपना ही रह जाएगा
ये दुनिया घूमने का सपना
सपना ही रह जाएगा
फिर हर रोज़ पशेमाँ हो के
मैं बीती बातें सोचूॅंगा
और ख़ुद को कोसूॅंगा
ये भी किया जा सकता था
वो भी किया जा सकता था
यूँॅं ज़िन्दगी गुज़ार दी है
खुल के जिया जा सकता था
और फिर अपनी नज़्म पढूॅंगा
उम्र निकलती जाएगी
मौत का ख़ौफ़ रहेगा
फिर धीरे-धीरे क्या होगा
इक दिन इन सब से तंग आके
मैं शायद ख़ुद-कुशी करूँॅंगा
शे'र लिखा होगा दीवार-ओ-दर पर
एक बहुत अच्छा सा
लगता है हर रोज़ यही
इक ऐसा दिन भी आएगा
मुझ को ये डर है कि शायद
ये सब कुछ सच हो जाएगा















