न लहजे में तेरे नरमी न आँखों में मुहब्बत हैमुहब्बत को भी मातम सा मनाता हो कोई जैसेमेरा ही अक्स मुझ को छोड़कर होता है रुख़सत यूँवो समझौतों की चादर फिर बिछाता हो कोई जैसे— Divya Gosain