
ग़ज़ल है आत्मा फिर भी नज़ाकत की ज़रूरत है
बूढ़ापो के मोहल्ले में शरारत की ज़रूरत है
ये दुनिया जान कर भी कुछ नहीं करती मेरे ख़ातिर
मुझे उस की ज़रूरत है उसे मेरी ज़रूरत है
— Aryan Goswami
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