"कौन सुनता उस की"
वो गई नीर भरने को बर्तन में
भर लाई नयनों में
वो सूरज की आग को दिन में सहती
मन की आग को रैनों में
क्या कहती वो किस से कहती वो
कौन सुनता उस की
कहना चाहा तो बेड़ियाँ आ गई
कभी पैरों में कभी गहनों में
कभी चीर से ढका तन कभी ढका मन को
कभी पिता की पीड़ा ख़ातिर
ढक लिया जीवन को
क्या कहती वो किस से कहती वो
कौन सुनता उस की
— Akash Gagan Anjaan















