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इक दिया था ग़म में सजा हुआ अपने ही दम पर डटा हुआ
जिस की दीद थी मेरी ज़िंदगी वो कहीं पर है सजा हुआ
जिस की दीद थी मेरी ज़िंदगी वो कहीं पर है सजा हुआ
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अपनी मीज़ान बनाया था कभी
ग़म को वीरान बनाया था कभी
ग़म को वीरान बनाया था कभी
इक जहान उस ने सजाया था कभी
हम को इंसान बताया था कभी
ख़ैर-ओ-शर जिस
में गिने जा सकते
ऐसा मीज़ान बनाया था कभी
जा के धरती पे बसेरा कर लो
उस को फ़रमान बनाया था कभी
जिस्म बेकार था मेरा जिस बिन
वो मेरी जान बनाया था कभी
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तुम्हें दिल में बसाया तो सही
तुम्हें अपना बनाया तो सही
तुम्हें अपना बनाया तो सही
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ग़म को वीरान बनाया था कभी
ऐसा ईमान बनाया था कभी
ऐसा ईमान बनाया था कभी
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