मेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ मैं किधर जाता हूँ
वो जहाँ बोलती है बस मैं उधर जाता हूँ
वो कहीं छाँव की मानिंद ठहर जाती है
मैं कहीं धूप की मानिंद बिखर जाता हूँ
एक तिनके का सहारा भी तो हो सकता है
और फिर उसपे गुज़ारा भी तो हो सकता है
ऐन मुमकिन है मुझे छोड़ के जाने वाला
शख़्स वो यार तुम्हारा भी तो हो सकता है
वो जिसे मैं न समझ पा रहा हूँ क्या मालूम
वो तेरी ओर इशारा भी तो हो सकता है
ऐन मुमकिन है कि जिस हाल में था मैं पहले
हाल मेरा वो दुबारा भी तो हो सकता है
वो ख़सारा जो मुहब्बत में हुआ है मुझको
वो ख़सारा मुझे प्यारा भी तो हो सकता है
क्या ज़रूरी है मेरे साथ रहे वो हर दम
एक वादे पे गुज़ारा भी तो हो सकता है
यूँ न हँस हँस के बता बात सभी को उसकी
वो मुझे जान से प्यारा भी तो हो सकता है
कोई दरिया कभी ख़ारा नही होता लेकिन
मेरे अश्कों से वो ख़ारा भी तो हो सकता है
एक दरिया को समंदर में जा के है मिलना
एक दरिया को किनारा भी तो हो सकता है
तेरी गलियों से कुछ इस तरह गुज़र जाऊँगा
जो नज़र आऊँ न तुझको तो किधर जाऊँगा
पहले उतरूँगा तेरे चश्म के काशाने में
फिर तेरी नज़रों से यकलख़्त उतर जाऊँगा
तेरी रुख़्सत से भला और तो क्या ही होगा
मैं तो बिखरा था अबस और बिखर जाऊँगा
और तड़पूँगा जलाने से ये भी मुमकिन है
पर मैं लोहा हूँ जो जलने से निखर जाऊँगा
ऐन मुमकिन है कि फिर इश्क़ के इस दरिया में
तैर सकता हूँ मैं जो डूब अगर जाऊँगा
नाम बदनाम हो चाहे मिले मुझको शोहरत
काम कुछ ऐसा गज़ल-गोई में कर जाऊँगा
तोड़ दूँगा मैं सभी नफ़रतों की दीवारें
मैं मुहब्बत ही मुहब्बत यहाँ भर जाऊँगा
तुम्हें न रूठ के यूँ मुझसे जाना चाहिए था
मुझे सताने तुम्हें यार आना चाहिए था
मैं अब समझ गया तुम मुझपे क्यों बिगड़ती थी
तुम्हें बिछड़ने का कोई बहाना चाहिए था
ज़रा सी बात पे तुम छोड़ कर गई मुझको
ज़रा सी बात पे तो रूठ जाना चाहिए था
अगर वो बात थी तो मुझसे क्यों छुपा रक्खी
अगर ये बात हैं तो फिर बताना चाहिए था
बस इतना काम मुहब्बत में करना था तुमको
बिछड़ते वक्त ज़रा मुस्कुराना चाहिए था
मुलाहिज़ा भी नहीं शेर पर करे कोई
कम-अज़-कम आपने मिस्रा उठाना चाहिए था
लुत्फ जब आता नहीं है आशिक़ी से
काम लेते क्यों नहीं तब शायरी से
दोस्ती का वास्ता क्या दे रहा है
वास्ता क्या है तेरा कुछ दोस्ती से
जिस तरह मैं देखता हूँ यार तुझको
देखता है कौन इतनी सादगी से
रूठने पे कौन मुझको है मनाता
सो कोई शिकवा नहीं मुझको किसी से
हमारे जैसा कोई दर-ब-दर नहीं होगा
कहीं पे होगा भी तो इस कदर नहीं होगा
निकल गया हूँ क़ज़ा के परे तो मैं कबका
दे जहर भी कोई तो अब असर नहीं होगा