9
0 Likes
8
0 Likes
6
0 Likes
हवा-ए-सुब्ह-ए-नुमू दुश्मन-ए-चमन कैसे
शिकार-ए-रश्क-ओ-रक़ाबत गुल-ओ-समन कैसे
शिकार-ए-रश्क-ओ-रक़ाबत गुल-ओ-समन कैसे
हिसार-ए-शाम-ओ-सहर और ज़ब्त-ए-अहल-ए-नफ़स
निज़ाम-ए-जब्र में बेबस ये मर्द-ओ-ज़न कैसे
न कोई बात हुई और न कोई दिल ही दुखा
बुझे बुझे से ये शुराका-ए-अंजुमन कैसे
न कोई हाथ उठा और न कोई ज़ेर हुआ
तो फिर बताओ कि ये चाक पैरहन कैसे
खुले तो किस पे खुले रंग-ए-ए'तिबार-ए-सुख़न
ये साहिबान-ए-नज़र बद-गुमान-ए-फ़न कैसे
5
0 Likes
4
0 Likes
कोई बादल तपिश-ए-ग़म से पिघलता ही नहीं
और दिल है कि किसी तरह बहलता ही नहीं
और दिल है कि किसी तरह बहलता ही नहीं
सब यहाँ बैठे हैं ठिठुरे हुए जम्मू को लिए
धूप की खोज में अब कोई निकलता ही नहीं
सिर्फ़ इक मैं हूँ जो हर रोज़ नया लगता हूँ
वर्ना इस शहर में तो कोई बदलता ही नहीं
3
0 Likes
2
0 Likes









