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वो ख़ुशबू भी अब इस चमन में नहीं है
जो तू मेरे दिल के भवन में नहीं है
जो तू मेरे दिल के भवन में नहीं है
छुअन की जो शीतलता तुझ से मिली थी
कहीं अब वो बहती पवन में नहीं है
किसे देख कर हम समर्पण करेंगे
वो जादू किसी के नयन में नहीं है
कमी तितलियों ने निकाली है ऐसी
तिरे जैसा रस अब सुमन में नहीं है
तुम्हारे सुरों सी मधुरता कहाँ है
लगे जैसे कोयल ही वन में नहीं है
दिखें तेरे भीतर ही सातों अजूबे
सो चाहत कोई और मन में नहीं है
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वो मुझ से रूठ जाती है तो दिल मेरा ये कहता है
ख़िज़ाँ के बा'द आएँगी बहारें लौट कर इक दिन
ख़िज़ाँ के बा'द आएँगी बहारें लौट कर इक दिन
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रूठ कर जब वो घर गया होगा
शीशे सा फिर बिखर गया होगा
शीशे सा फिर बिखर गया होगा
आइना भी झगड़ रहा था कल
क्योंकि चेहरा उतर गया होगा
साथ रह कर भी रो दिया था जो
दूर वो किस क़दर गया होगा
इश्क़ था बस उफ़ान पर कल तक
आज दरिया उतर गया होगा
क्या मिलेगा उसे सिवा ग़म के
ग़म मिलेगा जिधर गया होगा
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हो गई है दूर इतना आदमी से ज़िन्दगी
ज़िन्दगी ही माँगती है ज़िन्दगी से ज़िन्दगी
ज़िन्दगी ही माँगती है ज़िन्दगी से ज़िन्दगी
ख़ुद चराग़ों को बुझा कर सोचता हूँ बेवजह
क्यूँ ख़फ़ा है यार मेरी रौशनी से ज़िन्दगी
बाँटने को ग़म हमें जब मिल न पाया यार तो
कट रही है अब हमारी शा'इरी से ज़िन्दगी
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