चुप-चाप बैठे रहते हैं अब तो अपने घर में
होली तो पहले खेला करते थे यार हम लोग
ये अब सहा नहीं जाता कि इक ही महफ़िल में
रहे तू और मैं फिर भी हमारी बात न हो
बता भी दो ज़रा तुम मेरा दिल कब तक दुखाओगे
कभी मिलने भी आओगे कि बस यूँही रुलाओगे
शाम होते जब तुम आई याद तो मैं रो पड़ा
तुम को खो कर जब हुआ बर्बाद तो मैं रो पड़ा