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ये सैल-ए-अश्क मुझे गुफ़्तुगू की ताब तो दे
जो ये कहूँ कि वफ़ा का मिरी हिसाब तो दे
जो ये कहूँ कि वफ़ा का मिरी हिसाब तो दे
भरी बहार-रुतों में भी ख़ार ले आई
ये इंतिज़ार की टहनी कभी गुलाब तो दे
नहीं नहीं मैं वफ़ा से किनारा-कश तो नहीं
वो दे रहा है मुझे हिज्र का अज़ाब तो दे
ये ख़ामुशी तो क़यामत की जान लेवा है
वो दिल दुखाए मगर बात का जवाब तो दे
हर एक वाक़िआ' तारीख़-दार लिख जाऊँ
गए दिनों की मिरे हाथ वो किताब तो दे
ये देख किस गुल-ए-तर पर निगाह ठहरी है
न दे वो फूल मुझे दाद-ए-इंतिख़ाब तो दे
गुनाहगार सही फिर भी मेरे हिस्से का
तिरी तरफ़ जो निकलता है वो सवाब तो दे
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ग़मों से अपने कोई शख़्स चूर होता है
किसी के दिल में ख़ुशी का ग़ुरूर होता है
किसी के दिल में ख़ुशी का ग़ुरूर होता है
बड़े जतन से किसी को भुला दिया हम ने
बड़े जतन से ये सहरा उबूर होता है
किसी की कोई दुआ भी न हो सकी पूरी
किसी किसी की दु'आओं में नूर होता है
किसी की दूरियाँ दिल को सता सता मारें
क़रीब रह के कोई शख़्स दूर होता है
जहाँ में नामवरों के अज़ाब क्या कहिए
ज़रा सी बात का चर्चा ज़रूर होता है
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जब कभी हादसात ने मारा
यूँ लगा काएनात ने मारा
यूँ लगा काएनात ने मारा
वो जो मंसूर की अदा ठहरी
उस को इज़हार-ए-ज़ात ने मारा
लोग दुनिया का ग़म उठाते हैं
हम को छोटी सी बात ने मारा
हम न मुँह फेर कर गुज़र पाए
चंद लम्हों के सात ने मारा
दिन तो कट ही गया था उन का मगर
कम-नसीबों को रात ने मारा
मौत का दम सबा ग़नीमत है
वर्ना पल पल हयात ने मारा
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तुम्हारी ये सख़ावतें तुम्हारी ये इनायतें
जो ग़म तुम्हारे पास था हमारे नाम कर दिया
दिलों का भेद खुल गया तो फिर अजीब रंग में
दबी दबी सी बात को किसी ने आम कर दिया
किसी को सुर्ख़-रू किया किसी की बज़्म-ए-शौक़ में
ज़रा ज़रा सी बात पर ये एहतिमाम कर दिया
कभी हमें बुरा लगा कभी हमें भला लगा
हमारे दिल की बात को किसी ने आम कर दिया
उड़ान ख़ूब-तर हुई जो पंछियों की डार की
तो घेर-घार कर किसी ने ज़ेर-ए-दाम कर दिया
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अगर नहीं है इजाज़त सवाल मत करना
और अपने दिल में ज़ियादा मलाल मत करना
और अपने दिल में ज़ियादा मलाल मत करना
नहीं थी कोई ख़बर क्या है आस-पास मिरे
मैं अपनी सोच में गुम थी ख़याल मत करना
ख़ुशी से गुज़रे ये सब के लिए तो अच्छा है
ये ज़िंदगी है इसे भी वबाल मत करना
'सबा' जो आएगी मुश्किल वो हल भी कर लेंगे
ख़ुद अपने वास्ते जीना मुहाल मत करना
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