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Rafia Shabnam Abidi

Top 10 of Rafia Shabnam Abidi

Rafia Shabnam Abidi

Top 10 of Rafia Shabnam Abidi

    तुम मिरे पास रहो साथ रहो
    और ये एहसास रहे
    मैं कि आज़ाद हूँ जीने के लिए
    और ज़िंदा हूँ ख़ुद अपने अंदर
    अपनी ही ज़ात में ताबिंदा हूँ
    अपनी हर साँस पे क़ब्ज़ा है मिरा
    अपनी पाकीज़ा तमन्नाओं की तकमील का हक़ है मुझ को
    अपने मासूम से जज़्बात की तर्सील का हक़ है मुझ को
    ये ज़मीं मेरी भी ये दश्त-ओ-चमन मेरे भी
    सिर्फ़ आँगन ही नहीं कोह-ओ-दमन मेरे भी
    माह-ओ-अंजुम भी मिरे नीला तबक़ मेरा भी
    जितना उन पर है तुम्हारा वही हक़ मेरा भी
    शर्त बस ये है
    कि तुम साथ रहो पास रहो
    मेरी हर मर्ज़ी में शामिल हो तुम्हारी मर्ज़ी
    मेरी हर साँस की शाहिद हों तुम्हारी साँसें
    मेरे हर राज़ की हासिल हो तुम्हारी धड़कन
    और हम एक ही ज़ंजीर में पा-बस्ता हों
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    Rafia Shabnam Abidi
    10
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    आज भी कोई कहीं गोश-बर-आवाज़ न था
    आज भी चारों तरफ़ लोग थे अंधे बहरे
    आज भी मेरी हर इक सोच पे बैठे पहरे
    आज भी तुम मिरी हर साँस के मालिक ठहरे

    मेरा गुम-नाम सा खोया सा ये बेचैन वजूद
    एक पहचान का सदियों से जो दीवाना रहा
    आज भी अपने से बेगाना रहा
    और जिया भी तो जिया बन के किसी का साया
    आज भी मुझ से मिरा मैं नहीं मिलने पाया
    आज भी मैं ने ख़ुद अपने से मुलाक़ात न की
    एक पल ही को सही
    अपने ही दिल से मगर दिल की कोई बात न की
    बीती सदियों की तरह
    आज भी आज का दिन बीत गया
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    Rafia Shabnam Abidi
    9
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    अपने बढ़ते हुए बालों को कटा लूँ तो चलूँ
    ग़ुस्ल-ख़ाने में ज़रा धूम मचा लूँ तो चलूँ
    और एक केक मज़ेदार सा खा लूँ तो चलूँ
    अभी चलता हूँ ज़रा प्यास बुझा लूँ तो चलूँ
    रात में इक बड़ा दिलचस्प तमाशा देखा
    मुझ से मत पूछ मिरे यार कि क्या क्या देखा
    ठीक कहते हो मधुर सा कोई सपना देखा
    आँख तो मल लूँ ज़रा होश में आ लूँ तो चलूँ
    मैं थका-हारा था इतने में मदारी आया
    उस ने कुछ पढ़ के मिरे सर को ज़रा सहलाया
    मैं ने ख़ुद को किसी रंगीन महल में पाया
    ऐसे दो-चार महल और बना लूँ तो चलूँ
    जाने क्या बात है बाजी को जो है मुझ से जलन
    सब से कहती हैं कि इस लौंडे के बिगड़े हैं चलन
    मुझ को पीटा तो मिरा अश्कों से भीगा दामन
    अपने भीगे हुए दामन को सुखा लूँ तो चलूँ
    मेरी आँखों में अभी तक है शरारत का ग़ुरूर
    अपनी दानाई का या'नी कि हिमाक़त का ग़ुरूर
    दोस्त कहते हैं इसे तो है ज़ेहानत का ग़ुरूर
    ऐसे वहमों से अभी ख़ुद को निकालूँ तो चलूँ
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    Rafia Shabnam Abidi
    8
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    वो तेरी याद के लम्हे तिरे ख़याल के दिन
    इलाज-ए-दर्द के ज़ख़्मों के इंदिमाल के दिन

    वो इक रची बसी तहज़ीब अपने पुरखों की
    वो दो या चार सही थे मगर मिसाल के दिन

    मुझे तो याद है अब तक वो क्या ज़माना था
    तिरे जवाब का मौसम मिरे सवाल के दिन

    हर एक पल वो कभी रूठना कभी मनना
    नदामतों की वो घड़ियाँ वो इंफ़िआल के दिन

    मैं कुछ भी सुन न सकी थी वो ख़ौफ़ था 'शबनम'
    उसे भी होश भला कब था अर्ज़-ए-हाल के दिन
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    Rafia Shabnam Abidi
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    रोज़ उठता है धुआँ कोह-ए-निदा के उस पार
    चाँद चुप-चाप सुलगता है फ़ज़ा के उस पार

    भीग जाती है ये मासूम सी धरती हर सुब्ह
    कौन रोता है बताओ तो घटा के उस पार

    सरहद-ए-जिस्म से आगे हद-ए-इम्काँ से परे
    शहर-ए-जाँ रहता है दीवार-ए-अना के उस पार

    नेकियाँ बाँटते रहने की सज़ा लाज़िम है
    पारा पारा है बदन कू-ए-जज़ा के उस पार

    मैं कि मँझधार में हूँ कौन निकाले 'शबनम'
    छुप गया वो तो कहीं मुझ को बुला के उस पार
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    Rafia Shabnam Abidi
    6
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    घिरे हैं चारों तरफ़ बेकसी के बादल फिर
    सुलग रहा है सितारों भरा इक आँचल फिर

    बस एक बार उन आँखों को उस ने चूमा था
    हमेशा नम ही रहा आँसुओं से काजल फिर

    ये कैसी आग है जो पोर पोर रौशन है
    ये किस ने रख दी मिरी उँगलियों पे मशअ'ल फिर

    फिर अब की बार लहू-रंग बारिशें बरसें
    किसी ने काट दिए हैं सरों के जंगल फिर

    रगों में तपती हुई ख़ुशबुएँ मचलने लगीं
    मला बदन पे नए मौसमों ने संदल फिर

    कहीं तो रेत से चश्मा निकल ही आएगा
    भटक रहा है वो काँधों पे ले के छागल फिर

    फिर उस अकेली भरी दोपहर ने झुलसा है
    कि याद आने लगा सुब्ह से वो पागल फिर
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    Rafia Shabnam Abidi
    5
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    बदलती रुत पे हवाओं के सख़्त पहरे थे
    लहू लहू थी नज़र दाग़ दाग़ चेहरे थे

    ये राज़ खुल न सका हर्फ़-ए-नारसा पे मिरे
    सदाएँ तेज़ बहुत थीं कि लोग बहरे थे

    वो पूजने की सियासत से ख़ूब वाक़िफ़ था
    वही चढ़ाए जो गेंदे के ज़र्द सेहरे थे

    जो भाई लौट के आए कभी न दरिया से
    उन्हीं के बाज़ू क़वी थे बदन इकहरे थे

    उसी सबब से मिरा अक्स टूट टूट गया
    उस आइने में कई और भी तो चेहरे थे

    समुंदरों का वो प्यासा था और ओस थी मैं
    वो अब्र लौट गया जिस के लब सुनहरे थे

    इन आँचलों पे कोई सज्दा-रेज़ हो न सका
    कि जिन के रंग बहुत शोख़ और गहरे थे

    समाअ'तों के धुँदलकों में खो गए 'शबनम'
    वो सारे लफ़्ज़ जो पलकों पे आ के ठहरे थे
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    Rafia Shabnam Abidi
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    मई का आग लगाता हुआ महीना था
    घटा ने मुझ से मिरा आफ़्ताब छीना था

    बजा कि तुझ सा रफ़ूगर न मिल सका लेकिन
    ये तार तार वजूद एक दिन तो सीना था

    उसे ये ज़िद थी कि हर साँस उस की ख़ातिर हो
    मगर मुझे तो ज़माने के साथ जीना था

    ये हम ही थे जो बचा लाए अपनी जाँ दे कर
    हवा की ज़द पे तिरी याद का सफ़ीना था

    नदी ख़जिल थी कि भीगी हुई थी पानी में
    मगर पहाड़ के माथे पे क्यूँ पसीना था

    तुम उन सुलगते हुए आँसुओं का ग़म न करो
    हमें तो रोज़ ही ये ज़हर हँस के पीना था

    तमाम-उम्र किसी का न बन सका 'शबनम'
    वो जिस को बात बनाने का भी क़रीना था
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    Rafia Shabnam Abidi
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    एक इक कर के सभी लोग बिछड़ जाते हैं
    दिल के जंगल यूँही बस्ते हैं उजड़ जाते हैं

    कैसे ख़ुश-रंग हूँ ख़ुश-ज़ाएक़ा फल हूँ लेकिन
    वक़्त पर चक्खे नहीं जाएँ तो सड़ जाते हैं

    अपने लफ़्ज़ों के तअस्सुर का ज़रा ध्यान रहे
    हाकिम-ए-शहर कभी लोग भी उड़ जाते हैं

    रेत तारीख़ के सीने में हटाते हैं वही
    आबले प्यासी ज़बानों में जो पड़ जाते हैं

    ऐसे कुछ हाथ भी होते हैं कि जिन के कंगन
    तोड़ने वाले के एहसास में गड़ जाते हैं

    'शबनम' अंदाज़-ए-तकल्लुम में कशिश लाज़िम है
    वर्ना अल्फ़ाज़ सिमटते हैं सिकड़ जाते हैं
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    Rafia Shabnam Abidi
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    भूल जाते हैं तक़द्दुस के हसीं पल कितने
    लोग जज़्बात में हो जाते हैं पागल कितने

    रोज़ ख़ुश्बू के मुक़द्दर में रही ख़ुद-सोज़ी
    अपनी ही आग में जलते रहे संदल कितने

    सब्ज़ मौसम न यहाँ फिर से पलट कर आया
    हो गए ज़र्द मिरे गाँव के पीपल कितने

    ख़ुद-कुशी क़त्ल-ए-अना तर्क-ए-तमन्ना बैराग
    ज़िंदगी तेरे नज़र आने लगे हल कितने

    बारिशें होती हैं जिस वक़्त भरी आँखों की
    राख हो जाते हैं जलते हुए आँचल कितने

    हर क़दम कोई दरिंदा कोई खूँ-ख़्वार उक़ाब
    शहर की गोद में आबाद हैं जंगल कितने

    बे-रुख़ी उस की रुलाएगी लहू क्या 'शबनम'
    ज़ख़्म खाते ही रहे हम तो मुसलसल कितने
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    Rafia Shabnam Abidi
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