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आज भी कोई कहीं गोश-बर-आवाज़ न था
आज भी चारों तरफ़ लोग थे अंधे बहरे
आज भी चारों तरफ़ लोग थे अंधे बहरे
आज भी मेरी हर इक सोच पे बैठे पहरे
आज भी तुम मिरी हर साँस के मालिक ठहरे
मेरा गुम-नाम सा खोया सा ये बेचैन वजूद
एक पहचान का सदियों से जो दीवाना रहा
आज भी अपने से बेगाना रहा
और जिया भी तो जिया बन के किसी का साया
आज भी मुझ से मिरा मैं नहीं मिलने पाया
आज भी मैं ने ख़ुद अपने से मुलाक़ात न की
एक पल ही को सही
अपने ही दिल से मगर दिल की कोई बात न की
बीती सदियों की तरह
आज भी आज का दिन बीत गया
Read Fullआज भी तुम मिरी हर साँस के मालिक ठहरे
मेरा गुम-नाम सा खोया सा ये बेचैन वजूद
एक पहचान का सदियों से जो दीवाना रहा
आज भी अपने से बेगाना रहा
और जिया भी तो जिया बन के किसी का साया
आज भी मुझ से मिरा मैं नहीं मिलने पाया
आज भी मैं ने ख़ुद अपने से मुलाक़ात न की
एक पल ही को सही
अपने ही दिल से मगर दिल की कोई बात न की
बीती सदियों की तरह
आज भी आज का दिन बीत गया
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मई का आग लगाता हुआ महीना था
घटा ने मुझ से मिरा आफ़्ताब छीना था
घटा ने मुझ से मिरा आफ़्ताब छीना था
बजा कि तुझ सा रफ़ूगर न मिल सका लेकिन
ये तार तार वजूद एक दिन तो सीना था
उसे ये ज़िद थी कि हर साँस उस की ख़ातिर हो
मगर मुझे तो ज़माने के साथ जीना था
ये हम ही थे जो बचा लाए अपनी जाँ दे कर
हवा की ज़द पे तिरी याद का सफ़ीना था
नदी ख़जिल थी कि भीगी हुई थी पानी में
मगर पहाड़ के माथे पे क्यूँ पसीना था
तुम उन सुलगते हुए आँसुओं का ग़म न करो
हमें तो रोज़ ही ये ज़हर हँस के पीना था
तमाम-उम्र किसी का न बन सका 'शबनम'
वो जिस को बात बनाने का भी क़रीना था
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एक इक कर के सभी लोग बिछड़ जाते हैं
दिल के जंगल यूँही बस्ते हैं उजड़ जाते हैं
दिल के जंगल यूँही बस्ते हैं उजड़ जाते हैं
कैसे ख़ुश-रंग हूँ ख़ुश-ज़ाएक़ा फल हूँ लेकिन
वक़्त पर चक्खे नहीं जाएँ तो सड़ जाते हैं
अपने लफ़्ज़ों के तअस्सुर का ज़रा ध्यान रहे
हाकिम-ए-शहर कभी लोग भी उड़ जाते हैं
रेत तारीख़ के सीने में हटाते हैं वही
आबले प्यासी ज़बानों में जो पड़ जाते हैं
ऐसे कुछ हाथ भी होते हैं कि जिन के कंगन
तोड़ने वाले के एहसास में गड़ जाते हैं
'शबनम' अंदाज़-ए-तकल्लुम में कशिश लाज़िम है
वर्ना अल्फ़ाज़ सिमटते हैं सिकड़ जाते हैं
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