मैं चुप रहूँ तो गोया रंज-ओ-ग़म-ए-निहाँ हूँ
बोलूँ तो सर से पा तक हसरत की दास्ताँ हूँ
बोलूँ तो सर से पा तक हसरत की दास्ताँ हूँ
मसरूर हो तू मुझ से मैं तुझ से शादमाँ हूँ
तू मेरा मेहमाँ हो मैं तेरा मेज़बाँ हूँ
कहती है उन की मस्ती होश आए तो मैं पूछूँ
ऐ बे-ख़ुदी बता दे इस वक़्त मैं कहाँ हूँ
इरशाद पर नज़र है ख़ामोश हूँ कि गोया
चाहो तो बे-ज़बाँ हूँ चाहो तो बा-ज़बाँ हूँ
जाँ घुल चुकी है ग़म में इक तन है वो भी मोहमल
मअ'नी नहीं हैं बिल्कुल मुझ में अगर बयाँ हूँ
मैं हूँ जुनूँ के हाथों मख़्लूक़ का तमाशा
ना-मेहरबाँ हूँ ख़ुद पर दुनिया पे मेहरबाँ हूँ
अल्लाह-रे उस की चौखट है बोसा-गाह-ए-आलम
कहता है संग-ए-असवद मैं संग-ए-आस्ताँ हूँ
कहता है मेरा नाला लब तक मैं आते आते
सौ जा थमा हूँ रह में इस दर्जा ना-तवाँ हूँ
नफ़रत हो जिस को मुझ से मिलने का उस से हासिल
नज़रों में क्यूँ सुबुक हूँ ख़ातिर पे क्यूँ गिराँ हूँ
मुद्दत में तुम मिले हो क्यूँ ज़िक्र-ए-ग़ैर आए
मैं अपने साए से भी ख़ल्वत में बद-गुमाँ हूँ
चुप रह गया पयामी लेकिन ये ख़ैर गुज़री
ख़त ने कहा कि सुनिए 'परवीं' की मैं ज़बाँ हूँ
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नर्गिसीं आँख भी है अबरू-ए-ख़मदार के पास
दूसरी और भी तलवार है तलवार के पास
दूसरी और भी तलवार है तलवार के पास
दुश्मनों का मिरी क़िस्मत से है क़ाबू मुझ पर
यार के पास है दिल यार है अग़्यार के पास
याद रखना जो हुई वादा-ख़िलाफ़ी उन की
बिस्तरा आन जमेगा तिरी दीवार के पास
क़ैदी-ए-ज़ुल्फ़ की क़िस्मत में है रुख़्सार की सैर
शुक्र है बाग़ भी है मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार के पास
चेहरा भी बर्क़ भी दिल लेने में गेसू भी बला
एक सा मोजज़ा है काफ़िर ओ दीं-दार के पास
ग़ैर बे-जुर्म हैं और मैं हूँ वफ़ा का मुजरिम
कौन आता भला मुझ से गुनहगार के पास
क़ब्र में सोएँगे आराम से अब ब'अद-ए-फ़ना
आएगा ख़्वाब-ए-अदम दीदा-ए-बेदार के पास
उस की क्या वज्ह मिरे होते वहाँ क्यूँ न रहें
क्यूँ रहे ज़ुल्फ़-ए-सियह आप के रुख़्सार के पास
होशियारी से हो 'परवीं' चमन-ए-हुस्न की सैर
दाम और दाना हैं दोनों रुख़-ए-दिलदार के पास
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ख़ुदा के फ़ज़्ल से हम हक़ पे हैं बातिल से क्या निस्बत
हमें तुम से तअल्लुक़ है मह-ए-कामिल से क्या निस्बत
हमें तुम से तअल्लुक़ है मह-ए-कामिल से क्या निस्बत
मह-ए-कनआँ को मेरे इस मह-ए-कामिल से क्या निस्बत
ज़ुलेख़ा के मुलव्विस दिल को मेरे दिल से क्या निस्बत
हमा का रम ज़ि-ख़ुद-कामी ब-बदनामी कशीद आख़िर
कभी मैं ने न सोचा राज़ को महफ़िल से क्या निस्बत
कहे जाता है जो वाइज़ सुने जाते हैं हम लेकिन
जो अहल-ए-दिल नहीं उस को हमारे दिल से क्या निस्बत
मुझे है सदमा-ए-हिज्राँ अदू को सैकड़ों ख़ुशियाँ
मिरे उजड़े हुए घर को भरी महफ़िल से क्या निस्बत
ख़ुदा ही फिर भरोसा है ख़ुदा है नाख़ुदा मेरा
वगर्ना मैं भँवर में हूँ मुझे साहिल से क्या निस्बत
फ़िराक़-ए-यार में मेरा दिल-ए-मुज़्तर न ठहरेगा
तुम्हीं सोचो सुकूँ को ताइर-ए-बिस्मिल से क्या निस्बत
कनीज़-ए-हज़रत-ए-मुश्किल-कुशा हूँ दिल से मैं 'परवीं'
तअल्लुक़ मुझ को आसानी से है मुश्किल से क्या निस्बत
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बहुत दिन दर्स-ए-उल्फ़त में कटे हैं
मोहब्बत के सबक़ बरसों रटे हैं
मोहब्बत के सबक़ बरसों रटे हैं
जुनूँ में हो गया है अब ये दर्जा
कि है हालत रदी कपड़े फटे हैं
हरम से वापसी पर मेरी दावत
हुई मय-ख़ाने में मय-कश डटे हैं
बहुत पीर-ए-मुग़ाँ ज़ी-हौसला है
शराब-ए-नाब के साग़र लुटे हैं
रियाज़ ओ ज़ोहद के जितने थे धब्बे
वो सारे नक़्श-ए-बातिल अब मिटे हैं
तबर्रुक थे मिरी तौबा के टुकड़े
बजाए नक़्ल महफ़िल में बटे हैं
अलम के दर्द के हसरत के ग़म के
मज़े जितने हैं सारे चटपटे हैं
नहीं बे-वजह वाइज़ रोनी सूरत
ये हज़रत आज रिंदों में पिटे हैं
हुए जारूब-कश उस दर के 'परवीं'
कि सारे गर्द मिट्टी में अटे हैं
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जाता रहा क़ल्ब से सारी ख़ुदाई का इश्क़
क़ाबिल-ए-तारीफ़ है तेरे फ़िदाई का इश्क़
क़ाबिल-ए-तारीफ़ है तेरे फ़िदाई का इश्क़
कैसी मुसीबत है ये गुल को ख़मोशी का शौक़
बुलबुल-ए-बेताब को हर्ज़ा-सराई का इश्क़
पड़ गई बकने की लत वर्ना यहाँ तक न था
वाइज़-ए-ना-फ़हम को हर्ज़ा-सराई का इश्क़
करता हूँ जो बार बार बोसा-ए-रुख़ का सवाल
हुस्न के सदक़े से है मुझ को गदाई का इश्क़
तुम को ख़ुदा ने दिया सारी ख़ुदाई का हुस्न
मुझ को अता कर दिया सारी ख़ुदाई का इश्क़
आशिक़ ओ माशूक़ की हाए निभे किस तरह
उन को कुदूरत का शौक़ मुझ को सफ़ाई का इश्क़
पूछ ले 'परवीं' से या क़ैस से दरयाफ़्त कर
शहर में मशहूर है तेरे फ़िदाई का इश्क़
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मुतकब्बिर न हो ज़रदार बड़ी मुश्किल है
सब है आसान ये सरकार बड़ी मुश्किल है
सब है आसान ये सरकार बड़ी मुश्किल है
कुफ़्र पर ख़ल्क़ है तय्यार बड़ी मुश्किल है
दीन बिल्कुल नहीं दरकार बड़ी मुश्किल है
कैसे टेढ़ा न चले मार बड़ी मुश्किल है
सीधी हो ज़ुल्फ़-ए-गिरह-दार बड़ी मुश्किल है
और होंगे वो कोई दाम में आने वाले
मुर्ग़-ए-दाना हो गिरफ़्तार बड़ी मुश्किल है
दिल है ग़मनाक तो कौनैन है मातम-ख़ाना
रोते हैं सब दर-ओ-दीवार बड़ी मुश्किल है
लोग कहते हैं कि दिल उस को न देना लेकिन
ब'अद इक़रार कै इनकार बड़ी मुश्किल है
शोला-ए-हुस्न-ए-बुताँ फूँक न दे आलम को
सुर्ख़ हैं फूल से रुख़्सार बड़ी मुश्किल है
इन दिनों हज़रत-ए-यूसुफ़ की वो ना-क़दरी है
नहीं बुढ़िया भी ख़रीदार बुरी मुश्किल है
मिल के रहना ही नहीं जानता याँ अब कोई
जान-ओ-दिल में भी है तकरार बड़ी मुश्किल है
न तरद्दुद का मज़ा है न सुकूँ की लज़्ज़त
कभी वा'दा कभी इनकार बड़ी मुश्किल है
तालिब-ए-सुल्ह हूँ मैं और नज़र तालिब-ए-जंग
रात दिन लड़ने पे तय्यार बड़ी मुश्किल है
हाए दुनिया में किसी में नहीं इतनी भी वफ़ा
जितना कुत्ता है वफ़ादार बड़ी मुश्किल है
आज तुम तेग़-ब-कफ़ हो तो सफ़ा-चट मैदाँ
कौन मरने पे हो तय्यार बड़ी मुश्किल है
जिंस-ए-दिल बेचने की हम को ज़रूरत 'परवीं'
और मादूम ख़रीदार बड़ी मुश्किल है
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निकाली जाए किस तरकीब से तक़रीर की सूरत
वो आईने की सूरत और मैं तस्वीर की सूरत
वो आईने की सूरत और मैं तस्वीर की सूरत
गिरफ़्तार-ए-मोहब्बत कर लिया बातों ही बातों में
तसलसुल से नुमायाँ हो गई ज़ंजीर की सूरत
ज़ियादा आईने से है मुनव्वर मुसहफ़-ए-आरिज़
और इस पर ख़ाल-ए-मुश्कीं आया-ए-ततहीर की सूरत
तिरे तेवर बदलते ही ज़माना हो गया दुश्मन
हिलाल-ए-ईद भी ज़ाहिर हुआ शमशीर की सूरत
सितम हो जाएगा गर बाल भी बेका हुआ उस का
निकल कर आह सीने से गई है तीर की सूरत
कभी मीठी निगाहें हैं कभी तेवर बदलते हैं
न मरता हूँ न जीता हूँ ये है ताज़ीर की सूरत
मज़ा क्या उस बुत-ए-बे-पीर से दिल के लगाने का
जो ख़ल्वत में हो बुत महफ़िल में हो तस्वीर की सूरत
ख़फ़ा होते ही कुछ का कुछ भवों का हो गया नक़्शा
कभी ख़ंजर की सूरत और कभी शमशीर की सूरत
जिसे मिल जाए ख़ाक-ए-पाक-ए-दश्त-ए-कर्बला 'परवीं'
पलट कर भी न देखे वो कभी इक्सीर की सूरत
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वक़्त पर आते हैं न जाते हैं
रोज़ इक़रार भूल जाते हैं
रोज़ इक़रार भूल जाते हैं
वो जो बे-वजह मुस्कुराते हैं
सैकड़ों वहम दिल में आते हैं
अश्क-ए-हसरत निकल के दामन में
जान से हाथ धोए आते हैं
जब तुम आते नहीं हो व'अदे पर
मलक-उल-मौत को बुलाते हैं
सो गया बख़्त जब से रो रो कर
सारे हम-सायों को जगाते हैं
उन को शर्म-ओ-हया नहीं आती
दिल चुरा कर नज़र चुराते हैं
बे-ख़ता है वो आसमाँ मुजरिम
इस को इल्ज़ाम क्यूँ लगाते हैं
जान कर बन गए हैं हम भोले
चुटकियों में किसे उड़ाते हैं
तेरे कूचे में हम भी अब थक कर
दिल के मानिंद बैठे जाते हैं
ग़ैर क्या और उस की हस्ती क्या
आप क्यूँ मुफ़्त ख़ौफ़ खाते हैं
कोई ताज़ा सितम किया ईजाद
देख कर वो जो मुस्कुराते हैं
आग पानी में क्यूँ लगाते हो
नेक जो लोग हैं बुझाते हैं
तुम मिरे दिल में हो तो देखूँ मैं
हूर ओ ग़िल्माँ कहीं समाते हैं
मैं ने पूछी जो वज्ह-ए-क़त्ल कहा
ठहरो दम ले के हम बताते हैं
इश्क़ तेरे तुफ़ैल दुनिया के
तंज़ें सुनते हैं ता'ने खाते हैं
बे-सबब क्या बिगड़ने का बाइस
आप 'परवीं' को भी बनाते हैं
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पहलू-ओ-पुश्त-ओ-सीना-ओ-रुख़्सार आइना
है रज़्म-गाह-ए-हुस्न का ये चार आइना
है रज़्म-गाह-ए-हुस्न का ये चार आइना
कफ़ आइना बर आइना रुख़्सार आइना
है सर से पाँव तक वो सितमगार आइना
हटता नहीं जो सामने से उस के रात दिन
हम से सिवा है तालिब-ए-दीदार आइना
ये तो मिरा रक़ीब है मैं मानता नहीं
क्यूँ देखता है आप को हर बार आइना
रुख़ का है अक्स दिल में तो रुख़ में है दिल का अक्स
है आइने के सामने हर बार आइना
ख़ल्वत में उस के नूर से आलम है तूर का
हैं आब-ओ-ताब से दर-ओ-दीवार आइना
ग़श खा के गिर पड़े न कहीं रोब-ए-हुस्न से
इस वास्ते है पुश्त ब-दीवार आइना
किस में है आब-ओ-ताब सिवा देख लीजिए
इक बार उस का चेहरा और इक बार आइना
रुख़ का और उस का हो गया इक बार फ़ैसला
अच्छा हुआ कि मान गया हार आइना
लबरेज़ है शुआ-ए-रुख़-ए-दिल-फ़रोज़ से
ले आब-ए-हुस्न-ए-साग़र-ए-सरशार आइना
'परवीं' जहाँ में उस की झपकती नहीं पलक
हैरत का आप करता है इक़रार आइना
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