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चाँदी जैसी झिलमिल मछली पानी पिघले नीलम सा
शाख़ें जिस पर झुकी हुई हैं दरिया बहते सरगम सा
शाख़ें जिस पर झुकी हुई हैं दरिया बहते सरगम सा
सूरज रौशन रस्ता देगा काले गहरे जंगल में
ख़ौफ़ अँधेरी रातों का अब नक़्श हुआ है मद्धम सा
दर्द न उट्ठा कोई दिल में लहू न टपका आँखों से
कहने वाला बुझा बुझा था क़िस्सा भी था मुबहम सा
हँसती गाती सब तस्वीरें साकित और मबहूत हुईं
लगता है अब शहर ही सारा एक पुराने एल्बम सा
सर्द अकेला बिस्तर 'फ़िक्री' नींद पहाड़ों पार खड़ी
गर्म हवा का झोंका ढूँडूँ जी से गीले मौसम सा
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काली रातों में फ़सील-ए-दर्द ऊँची हो गई
अंधी गलियों में ख़मोशी लाश बन के सो गई
अंधी गलियों में ख़मोशी लाश बन के सो गई
बर्फ़ से ठंडे अँधेरों की सिसकती गोद में
मरते लम्हों की उदासी दिल में काँटे बो गई
शहर की सोती छतें हों या फ़सुर्दा रास्ते
क़तरा क़तरा गिरती शबनम सब का चेहरा धो गई
नींद में डूबे शजर से चीख़ते पंछी उड़े
ख़ौफ़ के मारे हवा में कपकपी सी हो गई
इस अकेले-पन के हाथों हम तो 'फ़िक्री' मर गए
वो सदा जो ढूँडती थी जंगलों में खो गई
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आँधियाँ आती हैं और पेड़ गिरा करते हैं
हादसे ये तो यहाँ रोज़ हुआ करते हैं
हादसे ये तो यहाँ रोज़ हुआ करते हैं
उन के दिल में भी कोई खोज तो पिन्हाँ होगी
ये परिंदे जो हवाओं में उड़ा करते हैं
ख़ून का रंग लिए गर्म धुएँ के बादल
सर्द अख़बार के सीने से उठा करते हैं
इन अँधेरों में कोई राह तो रौशन होती
ये सितारे तो हर इक रात जला करते हैं
हार के ज़ख़्म कभी जीत की लज़्ज़त भी कभी
हम तसव्वुर में कई खेल रचा करते हैं
जिन के चेहरों पे कोई धूप न साया कोई
उन मकानों में अजब लोग रहा करते हैं
दिन के सहरा में जिसे ढूँड न पाएँ 'फ़िक्री'
शब के जंगल में वो आवाज़ सुना करते हैं
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कहाँ कहाँ से गुज़र रहा हूँ
मैं आँधियों में बिखर रहा हूँ
मैं आँधियों में बिखर रहा हूँ
किसी भी सूरत न चैन पाऊँ
ये किस तजस्सुस में मर रहा हूँ
मैं सुर्ख़ियों में कहाँ से होता
मैं हाशिए की ख़बर रहा हूँ
सभों को जाना है पार लेकिन
मैं पार जाने से डर रहा हूँ
न मेरी मंज़िल न कोई जादा
अज़ल से गर्द-ए-सफ़र रहा हूँ
मुझे तो मरना था ग़म में 'फ़िक्री'
मैं ग़म में जल कर निखर रहा हूँ
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