10
0 Likes
वो पास है तेरे दूर नहीं तू वासिल है महजूर नहीं
क्यूँ हब्ल-ए-मुरक्कब में है फँसा मुख़्तार है तू मजबूर नहीं
क्यूँ हब्ल-ए-मुरक्कब में है फँसा मुख़्तार है तू मजबूर नहीं
सरगर्म-ए-शौक़-ओ-हुज़ूर नहीं दिल सर्द है तू महरूर नहीं
जिस क़ल्ब में इश्क़ का नूर नहीं वो ताब-ए-जल्वा-ए-तूर नहीं
हर रंग में है वो जल्वा-नुमा तू एक हिजाब में जा के छपा
क्यूँ कोर सवाद हुआ है बता क्या आँखों में तिरे नूर नहीं
जो इश्क़ में बर-सर-ए-दार हुआ सरदार वही सरशार हुआ
सरमस्त विसाल-ए-यार हुआ किस तरह कहें मंसूर नहीं
जो बातिन में मशग़ूल हुए महबूब हुए मक़्बूल हुए
मजहूल हुए मारूफ़ कहाँ मशहूर जो हैं मंज़ूर नहीं
क्यूँ महव-ए-सर-ए-पिंदार हुआ ऐ मुश्त-ए-ख़ाक है नक़्श-ए-फ़ना
दुनिया में कहाँ है रंग-ए-बक़ा जमशेद नहीं मग़्फ़ूर नहीं
मस्तूर जो था मंज़ूर हुआ वो जल्वा-ए-रंग-ए-ज़ुहूर हुआ
जो हिजाब था रुख़ से दूर हुआ मुश्ताक़-लक़ा महजूर नहीं
जो आप हुआ बेनाम-ओ-निशाँ उस को है मिला वो जान-ए-जहाँ
मेराज-ए-विसाल है उस को कहाँ जो इश्क़ में चकना-चूर नहीं
मैं तेरा फ़िदा-ए-सरापा हूँ मैं तालिब-ए-वस्ल-ए-मुअर्रा हूँ
मुश्ताक़-ओ-शैदा तेरा हूँ मैं तालिब-ए-हूर-ओ-क़ुसूर नहीं
मख़मूर-ए-जाम-ए-बाक़ी है शैदा-ए-नवा-ए-इराक़ी है
सरशार-ए-मोहब्बत 'साक़ी' है सर-मस्त है ये मस्तूर नहीं
9
0 Likes
8
0 Likes
7
0 Likes
तुझे ख़ल्क़ कहती है ख़ुद-नुमा तुझे हम से क्यूँ ये हिजाब है
तिरा जल्वा तेरा है पर्दा-दर तेरे रुख़ पे क्यूँ ये नक़ाब है
तिरा जल्वा तेरा है पर्दा-दर तेरे रुख़ पे क्यूँ ये नक़ाब है
तुझे हुस्न माया-ए-नाज़ है दिल-ए-ख़स्ता महव-ए-नियाज़ है
कहूँ क्या ये क़िस्सा-ए-राज़ है मिरा इश्क़ ख़ाना-ख़राब है
ये रिसाला इश्क़ का है अदक़ तिरे ग़ौर करने का है सबक़
कभी देख इस को वरक़ वरक़ मिरा सीना ग़म की किताब है
तिरी जज़्ब में है रुबूदगी तेरे सुक्र में है ग़ुनूदगी
न ख़बर शुहूद-ओ-वजूद की न तरंग-ए-मौज-ए-सराब है
ये वही है 'साक़ी'-ए-शेफ़्ता जो है दिल से तेरा फ़रेफ़्ता
ये है तेरा बंदा गुरीख़ता कि जो ख़ाकसार-ए-तुराब है
6
0 Likes
5
0 Likes
हसरत-ओ-उम्मीद का मातम रहा
ये वो दिल है जो सदा पुर-ग़म रहा
ये वो दिल है जो सदा पुर-ग़म रहा
इक न इक मुझ पर सदा आलम रहा
मैं कभी बे-जाँ कभी बे-दम रहा
मेरी क़िस्मत की कजी का अक्स है
ये जो बरहम गेसू-ए-पुर-ख़म रहा
वो दिल-ए-ग़म-गीं है मेरा ग़म-पसंद
ग़म के जाने का भी जिस को ग़म रहा
दिल को हर-दम इक परेशानी रही
ज़ुल्फ़-ए-जानाँ की तरह बरहम रहा
वो नमक-अफ़्शानियाँ क़ातिल ने कीं
ज़ख़्म-ए-दिल शर्मिंदा-ए-मरहम रहा
बढ़ते बढ़ते हो गया नासूर दिल
ख़ून का क़तरा जो दिल में जम रहा
था फ़क़त इक ग़म मदार-ए-ज़िंदगी
ग़म रहा दिल में तो वो भी कम रहा
गिर्या-ओ-ज़ारी यही 'साक़ी' रही
दिल की हसरत का सदा मातम रहा
4
0 Likes
तलाश जिस नूर की है तुझ को छुपा है तेरे बदन के अंदर
ज़ुहूर-ए-आलम हुआ उसी से वो है हर इक जान-आे-तन के अंदर
ज़ुहूर-ए-आलम हुआ उसी से वो है हर इक जान-आे-तन के अंदर
तुझे ये बे-सर्फ़ा जद्द-ओ-कद है कशाकशी में भी शद्द-ओ-मद है
नफ़स की तुझ को अगर मदद है सफ़र है इस जा वतन के अंदर
तुझे वहाँ से गुरेज़ ओ रम है तलाश अब आहू-ए-हरम है
चला है वो राह जो भरम है, है मुश्क-ए-नाफ़ा ख़ुतन के अंदर
जहाँ में सारा है नूर तेरा हर एक शय में ज़ुहूर तेरा
मगर तख़य्युल है दूर तेरा पड़ा है बैत-उल-हुज़न के अंदर
तू ही मुहक़क़िक़ तू ही मुजद्दिद बना है तू आप ही मुक़ल्लिद
तू रस्म-ओ-रह का हुआ मुक़य्यद फँसा है ख़ुद मा-ओ-मन के अंदर
क़दीम वीराँ-कदा है हस्ती समझ इसे है फ़ना की बस्ती
ये तेरी हिम्मत की सब है पस्ती ज़ुबूँ है दहर-ए-कुहन के अंदर
अजीब अहमक़ है और सादा सवार हो कर हुआ पियादा
किधर चला ये नहीं है जादा तू क्यूँ भटकता है बन के अंदर
ये आतिश-ए-इश्क़ की है जिद्दत कि दिल में पैदा हुई है रिक़्क़त
ये सोज़-ए-ग़म की मिली है लज़्ज़त मज़ा है दिल की जलन के अंदर
हुआ है मस्त-ए-शराब-ए-गुलगूँ अकड़ रहा है वो सर्व-ए-मौज़ूँ
दिखा के हम को ये जाम-ए-वाज़ूँ ख़जिल किया अंजुमन के अंदर
हुआ है सरशार वहम-ए-'साक़ी' तुझे नहीं शौक़-ए-वस्ल बाक़ी
हवा-ए-दुनिया का है मिराक़ी पड़ा है आवागवन के अंदर
3
0 Likes
2
0 Likes
क्यूँ आ गए हैं बज़्म-ए-ज़ुहूर-ओ-नुमूद में
आज़ाद मर्द हो के रहे हम क़ुयूद में
आज़ाद मर्द हो के रहे हम क़ुयूद में
सालिक है क्यूँ तख़य्युल-ए-तर्क-ए-वजूद में
नक़्श-ए-सुवर का रंग है तेरे शुहूद में
जो आ गए तजल्ली-ए-तंज़ीह-ए-ज़ात में
महदूद किस तरीक़ से होंगे हुदूद में
राज़-ए-दरून-ए-पर्दा ज़े-रिंदान-ए-मस्त पुर्स
सालिक है क्यूँ हिजाब-ए-शुहूद-ओ-वजूद में
अरिनी ओ लन-तरानी का सब राज़ खुल गया
क्या नश्शा-ए-ग़रीब है शर्ब-उल-यहूद में
ऐ गुल जहाँ में जिन को तिरा इश्क़ हो गया
वो ख़ार से खटकते हैं चश्म-ए-हुसूद में
मशहूर-ए-ख़ल्क़ जो है वो मक़्बूल-ए-हक़ नहीं
क्यूँ अहमक़ों को नाज़ हुआ है नुमूद में
ताअत नहीं है वो कि जो हो बे-हुज़ूर-ए-क़ल्ब
ऐ शैख़ क्या धरा है रुकू-ओ-सुजूद में
है बुल-अजब ये ज़मज़मा-ए-सौत-ए-सरमदी
किस तरह आए मा'रिज़-ए-गुफ़्त-ओ-शुनूद में
सूफ़ी ये सहव महव हुए सद्द-ए-बाब-ए-उंस
क्या इम्बिसात कार-गह-ए-हसत-ओ-बूद में
तार-ए-नफ़स से है तन-ए-ख़ाकी बसा हुआ
है अंकबूत लिपटी हुई तार-ओ-पूद में
सूफ़ी यही है नूर-ए-सवाद-ए-हिजाब-ए-क़ल्ब
ज़ुल्मत हुई जो सीना-ए-सोज़ाँ के दूद में
फ़ैज़-ए-निगाह-ए-रहबर-ए-कामिल का है असर
'साक़ी' है महव ताअत-ए-रब्ब-ए-वदूद में
1
0 Likes









