दिल से पूछो क्या हुआ था और क्यूँ ख़ामोश था
आँख महव-ए-दीद थी इतना मुझे बस होश था
आँख महव-ए-दीद थी इतना मुझे बस होश था
वो भी क्या तासीर थी जिस ने हिलाए सब के दिल
क्या बताऊँ वो मिरा ही नाला-ए-पुर-जोश था
महफ़िल-ए-साक़ी में था कुछ और ही मस्तों का रंग
कोई साग़र ढूँढ़ता था और कोई बेहोश था
क्या अजब है जाएज़ा ले मय-परस्तों का कोई
याद रखना साक़िया मुझ सा भी इक मय-नोश था
क्या समझ सकता था कोई तेरे दीवाने की चुप
जब किसी ने उस से कुछ पूछा तो बस ख़ामोश था
बे-ख़ुदी से नश्शा-ए-जाम-ए-ख़ुदी उतरा तो फिर
एक ही साग़र मिला ऐसा कि मैं मदहोश था
इक हमीं को साक़िया पूछा न तू ने दौर मैं
वर्ना मय-ख़ाने में तेरे शोर नोशा-नोश था
किस क़दर था इश्तियाक़-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद उसे
मरने वाले का जनाज़ा आज दोशा-दोश था
ज़िंदगी-भर के गुनाहों से ये थी शरम ऐ अजल
तारिक-ए-हस्ती यहाँ से जब चला रू-पोश था
ग़ुंचे क्यूँ ख़ामोश आए गुलशन-ए-हस्ती में 'शौक़'
मौसम-ए-गुल से मगर ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ हम-दोश था
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वो हो इलाज-ए-दर्द मुदावा कहें जिसे
ऐसा तो हो कोई कि मसीहा कहें जिसे
ऐसा तो हो कोई कि मसीहा कहें जिसे
पुर्सान-ए-हाल कोई नहीं जिस का नाम लें
इक दर्द दिल ही है कि शनासा कहें जिसे
मुश्किल ये है कि आप तो सुनते ही कुछ नहीं
रूदाद-ए-इश्क़ वो कि फ़साना कहें जिसे
जल्वे से देखिए कहीं आँखें झपक न जाएँ
यूँ चश्म वा हो ज़ौक़-ए-तमाशा कहें जिसे
अल्लाह ऐसी दे तुझे तौफ़ीक़ ऐ जुनूँ
सर में वो धुन समाए कि सौदा कहें जिसे
सब हसरतों को ख़ाक में ज़ालिम मिला दिया
अब दिल में क्या रहा कि तमन्ना कहें जिसे
ये बार-ए-ज़िंदगी कहीं हल्का न 'शौक़' हो
इतना तो हो कि हासिल-ए-दुनिया कहें जिसे
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दिल बहलने का जहाँ में कोई सामाँ न हुआ
अपना हमदर्द कभी आलम-ए-इम्काँ न हुआ
अपना हमदर्द कभी आलम-ए-इम्काँ न हुआ
शिकवा-ए-हिज्र न भूले से भी आया लब पर
रू-ब-रू उन के मैं ख़ुद-कर्दा पशेमाँ न हुआ
हम-नशीं पूछ न हाल-ए-दिल-ए-नाकाम-ए-अज़ल
यही हसरत रही पूरा कोई अरमाँ न हुआ
बे-ख़ुदी में ये है आलम तिरे दीवानों का
फ़स्ल-ए-गुल आई मगर चाक गरेबाँ न हुआ
कोई क्या जाने कि क्या लुत्फ़ ख़लिश है हासिल
मेरा ही दिल है कि मिन्नत-कश-ए-दरमाँ न हुआ
यूँ तो हमदर्द ज़माना था ब-ज़ाहिर लेकिन
किसी सूरत से इलाज-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ न हुआ
बे-धड़क जाने की हिम्मत न हुई महशर में
मुँह छुपाने के लिए दस्त-ब-दामाँ न हुआ
दिल बहलता भी तो किस तरह बहलता शब-ए-ग़म
साज़-ओ-सामाँ न हुआ नग़्मा-ए-हिर्मां न हुआ
पुर्सिश-ए-हाल पे आँखों में भर आए आँसू
ऐसे मजबूर हुए ज़ब्त भी आसाँ न हुआ
ज़र्रे ज़र्रे से अयाँ हुस्न की रा'नाई है
वो हसीं तू है कि पर्दों में भी पिन्हाँ न हुआ
मैं था मुश्ताक़ तिरे जल्वे का ऐ माया-ए-हुस्न
रह के पर्दे में भी तो शो'ला-ए-उर्यां न हुआ
चैन से क़ैद तअ'य्युन में बसर की ऐ 'शौक़'
दिल भी जमईयत-ए-ख़ातिर से परेशाँ न हुआ
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जो मुहिब्बान-ए-वफ़ा हैं वो वफ़ा करते हैं
कुछ ग़रज़ इस से नहीं कोई जफ़ा करते हैं
कुछ ग़रज़ इस से नहीं कोई जफ़ा करते हैं
ख़ूगर-ए-दर्द हैं सब कुछ वो सहा करते हैं
दुश्मनों से नहीं मतलब कि वो क्या करते हैं
हम जिगर थाम के जब आह-ए-रसा करते हैं
इक क़यामत में क़यामत ही बपा करते हैं
चारा-गर का हो भला कौन रहीन-मिन्नत
हम तो ख़ुद अपनी ही ज़ख़्मों को सिया करते हैं
साज़ हो ऐश का या सूर-ए-मुसीबत दम-साज़
अब तो हर हाल में हम शुक्र अदा करते हैं
आप शरमा गए क्यूँ देख के रक़्स-ए-बिस्मिल
क्या कहीं तीर-ए-नज़र चल के ख़ता करते हैं
आतिश-ए-इश्क़-ए-वतन रखते हैं दिल में रौशन
अपनी ही आग में जल जल के बुझा करते हैं
हर हुबाब-ए-लब-ए-जू जल्वा-गह-ए-हस्ती है
नक़्श बन बन के ज़माने से मिटा करते हैं
'शौक़' सा बंदा-ए-आज़ाद ज़माने में कहाँ
आज सुनते हैं कि वो याद-ए-ख़ुदा करते हैं
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न ऐ दिल सूरत-ए-शैख़-ए-हरम दीवाना बन जाना
कहीं आना न जाना ज़ाएर-ए-बुत-ख़ाना बन जाना
कहीं आना न जाना ज़ाएर-ए-बुत-ख़ाना बन जाना
तुम्हारी दीदा-ए-मख़मूर को ये ख़ूब आता है
कभी शीशा कभी साग़र कभी पैमाना बन जाना
अजब आलम है मद-होशों का तेरी जोश-ए-मस्ती में
कभी दीवाना बन जाना कभी मस्ताना बन जाना
दिल-ए-सोज़ाँ दिखाना जल्वा हुस्न-ओ-इश्क़ दोनों का
कहीं शम-ए-शबिस्ताँ और कहीं परवाना बन जाना
ये थी तल्क़ीन-ए-साक़ी वक़्त-ए-रुख़्सत अपनी मस्तों को
कहीं दीवाना बन जाना कहीं फ़रज़ाना बन जाना
उसी में कुछ मफ़र अपना नज़र आया हसीनों को
कि जा कर देर में चुपके बुत-ए-बुत-ख़ाना बन जाना
करिश्में हैं ये सारे जलवा-ए-हुस्न-ए-हक़ीक़ी के
कहीं आशिक़ कहीं अंदाज़-ए-माशूक़ाना बन जाना
नवा-ए-राज़ साज़-ए-इश्क़ बे-ख़ुद क्यूँ न कर डाले
कि हर पर्दे से आती है सदा दीवाना बन जाना
यही इबरत-सरा-ए-दहर का हर रोज़ नक़्शा है
कहीं काशाना हो जाना कहीं वीराना बन जाना
ख़बर किस को थी यूँ आलम में रुस्वाई मिरी होगी
कि उन्वान-ए-मोहब्बत को भी था अफ़्साना न बन जाना
ये आलम बेख़ूदी-ए-इश्क़ का ऐ 'शौक़' क्या कहिए
तसव्वुर में किसी के आप से बेगाना बन जाना
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दिल में अगर न इश्क़-ओ-मोहब्बत की चाह हो
नाला न दर्द हो न फ़ुग़ाँ हो न आह हो
नाला न दर्द हो न फ़ुग़ाँ हो न आह हो
रुस्वा न ए'तिबार-ए-तग़ाफ़ुल को कीजिए
क्या फ़ाएदा कि पुर्सिश-ए-दिल गाह गाह हो
दुश्मन से पूछता हूँ निशान-ए-हरीम-ए-नाज़
मेरी तरह से कोई न गुम-कर्दा-राह हो
राह-ए-जुनूँ में मुझ को किसी से नहीं है काम
बस मैं हूँ और इक दिल-ए-शोरिश-पनाह हो
कर अब तू फ़िक्र हुस्न-ए-अमल कूच है क़रीब
रस्ता कठिन है साथ में कुछ ज़ाद-ए-राह हो
तौहीन-ए-शान 'अफ़्व है इस्याँ से इज्तिनाब
या'नी गुनाहगार है जो बे-गुनाह हो
दुनिया में ऐसे लोगों से पाला पड़े न 'शौक़'
ज़ाहिर हो जिन का साफ़ तो बातिन सियाह हो
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कौन सी वो शम्अ'' थी जिस का मैं परवाना हुआ
और फिर लौ भी लगी ऐसी कि दीवाना हुआ
और फिर लौ भी लगी ऐसी कि दीवाना हुआ
साक़ी-ए-सर-मस्त से जब तक कि लेने को बढ़ूँ
हाथ से गिरते ही चकना-चूर पैमाना हुआ
दिल हरीम-ए-नाज़ से ले कर तो हम निकले मगर
हो गया आलम कुछ ऐसा सब से बेगाना हुआ
ख़ैर थी उल्फ़त में दिल ने रंग कुछ बदला न था
अब तमाशा देखिएगा वो भी दीवाना हुआ
हम ने जाने क्या कहा लोगों ने क्या समझा उसे
सरगुज़िश्त-ए-दर्द-ए-दिल थी जिस का अफ़्साना हुआ
फ़ैज़ साक़ी ने बदल दी सूरत-ए-दिल और ही
पहले पैमाना था पैमाना से मय-ख़ाना हुआ
मेरे लब तक आते आते क्यूँ छलक जाता है 'शौक़'
जाम-ए-रंगीं साग़र-ए-मुल या कि पैमाना हुआ
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ला-मकाँ नाम है उजड़े हुए वीराने का
हूँ के आलम में है मस्कन तिरे दीवाने का
हूँ के आलम में है मस्कन तिरे दीवाने का
शौक़-ए-रुस्वा कोई देखे तिरे दीवाने का
ख़ुद वो आग़ाज़ बना है किसी अफ़्साने का
जाम-ए-दिल बादा-ए-उल्फ़त से भरा रहता है
वाह क्या ज़र्फ़ है टूटे हुए पैमाने का
दास्ताँ इश्क़ की है पूरी सुनाएँगे कलीम
क़िस्सा तूर तो इक बाब है अफ़्साने का
शम्अ''' ने बज़्म में जल जल के जलाया आख़िर
आह क्या हश्र हुआ इश्क़ में परवाने का
मुस्ततर क़ुलक़ुल-ए-मीना में है राज़-ए-मस्ती
भेद किस तरह खुले फिर तिरे मस्ताने का
हश्र में देख के मजमा' लब-ए-कौसर साक़ी
फिर गया आँखों में नक़्शा तिरे मयख़ाने का
मिलते ही साग़र-ओ-शीशा से छलक जाता है
ये भी क्या दौर है साक़ी तिरे पैमाने का
क्या क़यामत है कि महशर में भी पुर्सिश न हुई
हश्र अब देखिए क्या हो तिरे दीवाने का
सफ़्हा दिल मिरा आईना-ए-रम्ज़-ए-तौहीद
राज़-ए-कौनैन ख़ुलासा मिरे अफ़्साने का
'शौक़' अब किस लिए फ़िक्र-ए-मय-ओ-मय-ख़ाना है
भरने वाला तो कोई और है पैमाने का
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मरना मरीज़-ए-इश्क़ के हक़ में शिफ़ा हुआ
अच्छा हुआ नजात मिली क्या बुरा हुआ
अच्छा हुआ नजात मिली क्या बुरा हुआ
राह-ए-अदम की मंज़िल-ए-अव्वल में क्या हुआ
जो आया ख़ाक डाल के मुझ पर हवा हुआ
नश्तर को डूबने न दिया ऐ रग-ए-जुनूँ
क्या उस का एक क़तरा-ए-ख़ूँ में भला हुआ
जिस दिल के दाग़ से हमें थी चश्म-ए-रौशनी
रहता है वो तो शाम ही से ख़ुद बुझा हुआ
बस ऐसी चारासाज़ी से ऐ 'शौक़' बाज़ आए
जिस से कि दर्द और भी दिल में सिवा हुआ
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