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मुझे अब नया इक बदन चाहिए
और उस के लिए बाँकपन चाहिए
और उस के लिए बाँकपन चाहिए
मैं ये सोचता हूँ असर के लिए
सदा चाहिए या सुख़न चाहिए
भटकने से अब मैं बहुत तंग हूँ
ज़मीं क़ैद कर ले वतन चाहिए
नशे के लिए इक नया शीशा हो
और उस में शराब-ए-कुहन चाहिए
ये आँखें ये दिल ये बदन है तिरा
तुझे और क्या जान-ए-मन चाहिए
बहुत तुर्श लगने लगी ज़िंदगी
कोई मीठी मीठी चुभन चाहिए
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मैं फ़र्द-ए-जुर्म तेरी तय्यार कर रहा हूँ
ऐ आसमान सुन ले हुश्यार कर रहा हूँ
ऐ आसमान सुन ले हुश्यार कर रहा हूँ
इक हद बना रहा हूँ शहर-ए-हवस में अपनी
दर खोलने की ख़ातिर दीवार कर रहा हूँ
मालूम है न होगी पूरी ये आरज़ू भी
फिर दिल को बे-सबब क्यूँ बीमार कर रहा हूँ
फूलों-भरी ये शाख़ें बाँहों सी लग रही हैं
अब क्या बताऊँ किस का दीदार कर रहा हूँ
ये रास्ते कि जिन पर चलता रहा हूँ बरसों
आइंदगाँ की ख़ातिर हमवार कर रहा हूँ
आसानियों में जीना मुश्किल सा हो गया है
मैं ज़िंदगी को थोड़ा दुश्वार कर रहा हूँ
सा
में बना लिया है रातों को मैं ने अपना
ग़ज़लें सुना सुना के सरशार कर रहा हूँ
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मंज़र रोज़ बदल देता हूँ अपनी नर्म-ख़याली से
शाम शफ़क़ में ढल जाती है रंग-ए-हिना की लाली से
शाम शफ़क़ में ढल जाती है रंग-ए-हिना की लाली से
तुझ से बिछड़ कर ज़िंदा रहना अपने सोग में जीना है
दिल इक फूल था ख़ुश्बू वाला टूट गया है डाली से
शहर-ए-तरब को जाने किस की नज़र लगी है आज की शब
रस्ते भी वीरान पड़े हैं घर लगते हैं ख़ाली से
दुनिया वाले जिस को अक्सर रोना-धोना कहते हैं
आँखें दरिया बन जाती है जज़्बों की सय्याली से
धूल-भरे रस्तों के सफ़र ने तर्ज़-ए-फ़िक्र बदल डाला
ख़ौफ़-ज़दा सी रहने लगी है ख़ाक-ए-बदन पामाली से
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ऐसी तन-आसानी से
बाज़ आ जा नादानी से
बाज़ आ जा नादानी से
जीना मुश्किल होता है
इतनी नुक्ता-दानी से
सहरा भी शरमाता है
इस दिल की वीरानी से
लाज कहाँ तक आएगी
ख़्वाबों की उर्यानी से
प्यास नहीं बुझ पाती है
दरिया की दरबानी से
पीछा कौन छुड़ा पाया
इस दुनिया-दीवानी से
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उस के परतव से हुआ है ज़ा'फ़रानी रंग का
आईना तो आज भी है कहकशानी रंग का
आईना तो आज भी है कहकशानी रंग का
हिज्र के बादल छटे तो वस्ल की तक़्वीम में
दिल हुवैदा हो रहा है गुल्सितानी रंग का
पैरहन उस का है ऐसा या झलकता है बदन
इक परी-वश रक़्स में है उर्ग़ुवानी रंग का
आज की शब ख़ास होगी जब सुनाऊँगा उसे
एक क़िस्सा अपना ज़ाती दास्तानी रंग का
दोस्तों की मेहरबानी से हुआ ये काम भी
मैं ने देखा ही नहीं था ख़ून पानी रंग का
गर दिलों से यूँ धुआँ उठता रहेगा रात दिन
आसमाँ कैसे बचेगा आसमानी रंग का
हाँ उसी ने फूल टाँके होंगे इन अश्जार पर
जिस ने मिट्टी को दिया है जुब्बा धानी रंग का
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