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Nabeel Ahmad Nabeel

Top 10 of Nabeel Ahmad Nabeel

Nabeel Ahmad Nabeel

Top 10 of Nabeel Ahmad Nabeel

    किरन किरन ये किसी दीदा-ए-हसद में है
    हर इक चराग़ हमारा धुएँ की ज़द में है

    जिसे निकाला है हिंद सेों से ज़ाइचा-गर ने
    बक़ा हमारी उसी पाँच के अदद में है

    हर एक शख़्स की क़ामत को नाप और बता
    मिरे अलावा यहाँ कौन अपने क़द में है

    घरों के सहन कुछ ऐसे सिकुड़ सिमट गए हैं
    हर एक शख़्स मकीं जिस तरह लहद में है

    लगे हैं शाख़ों पे जिस दिन से फूल-पात नए
    हर एक पेड़ हवेली का चश्म-ए-बद में है

    'नबील' ऐसे अधूरे हैं रोज़-ओ-शब जैसे
    मिरा अज़ल किसी अंदेशा-ए-अबद में है
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    Nabeel Ahmad Nabeel
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    तय हुआ है उस तरफ़ की रहगुज़र का जागना
    मेरे पाँव में किसी लम्बे सफ़र का जागना

    बोलते थे क्या परिंदे से दर-ओ-दीवार पर
    याद है अब भी मुझे वो अपने घर का जागना

    अब कहाँ मौसम है वो दार-ओ-रसन का दोस्तो
    अब कहाँ उश्शाक़ के शानों पे सर का जागना

    वर्ना मुझ को धूप का सहरा कभी न छोड़ता
    आ गया है काम मेरे इक शजर का जागना

    इक पुरानी आरज़ू ठहरी उजालों की तलब
    इक पुराना ख़्वाब ठहरा है सहर का जागना

    आसमाँ खुलते गए मुझ पर ज़मीनों की तरह
    एक लम्हे के लिए था बाल-ओ-पर का जागना

    मैं 'नबील' इस ख़ौफ़ से इक उम्र सोया ही नहीं
    ज़िंदगी-भर का है सोना लम्हा-भर का जागना
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    Nabeel Ahmad Nabeel
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    सर झुका कर शाह के दरबार में
    छेद हम ने सौ किए दस्तार में

    ज़िंदगानी जैसी ये अनमोल शय
    काट दी है हसरत-ए-बे-कार में

    दामनों में भरते हैं महरूमियाँ
    ले के ख़ाली जेब हम बाज़ार में

    सुर्ख़ियाँ बन कर उगलती है लहू
    आदमियत शाम के अख़बार में

    सर को टकराते रहे हम उम्र-भर
    दर कोई निकला नहीं दीवार में

    जिस क़दर भरता रहा ऊँची उड़ान
    आदमी गिरता गया मेआ'र में

    सब परिंदे कर गए हिजरत 'नबील'
    कौन बैठे साया-ए-अश्जार में
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    Nabeel Ahmad Nabeel
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    इक यही अब मिरा हवाला है
    रूह ज़ख़्मी है जिस्म छाला है

    सैकड़ों बार सोच कर मैं ने
    तेरे साँचे में ख़ुद को ढाला है

    खिंचने वाला है आसमाँ सर से
    हादिसा ये भी होने वाला है

    इक ख़ुदा-तर्स मौज ने मुझ को
    साहिलों की तरफ़ उछाला है

    ग़ालिब आई हवस मोहब्बत पर
    आरज़ूओं का रंग काला है

    इक तरफ़ जाम आफ़ियत के हैं
    इक तरफ़ ज़हर का ही प्याला है

    कार-ए-दुनिया की आरज़ू ने 'नबील'
    मुझ को सौ उलझनों में डाला है
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    Nabeel Ahmad Nabeel
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    तुम ने किया है तुम ने इशारा बहुत ग़लत
    दरिया बहुत दुरुस्त किनारा बहुत ग़लत

    इस हार में है हाथ तुम्हारा बहुत ग़लत
    तुम ने किया है फ़ैसला सारा बहुत ग़लत

    हम डूब जाएँ अपने ही ग़म के बहाओ में
    हाँ हाँ ग़लत ग़लत मिरे यारा बहुत ग़लत

    इस किश्त-ए-दिल से इस के दिल-ए-रेग-ज़ार तक
    बहने लगा है ख़ून का धारा बहुत ग़लत

    अफ़सोस मुझ को इस पे सज़ा हिज्र की मिली
    मैं ने लिखा था नाम तुम्हारा बहुत ग़लत

    मैदाँ में एक फ़र्द भी ज़िंदा न मिल सका
    शब-ख़ून उस ने आख़िरी मारा बहुत ग़लत

    हम हैं ज़मीं के लोग मगर देख ऐ फ़लक
    लेता है इम्तिहाँ तू हमारा बहुत ग़लत

    होगा किसी तो रोज़ तुम्हारा हिसाब भी
    तुम ने किसी ग़रीब को मारा बहुत ग़लत

    वाक़िफ़ था अपने इश्क़ के अंजाम से मगर
    फिर भी किसी पे जान को वारा बहुत ग़लत

    हम दिल-ज़दों के वास्ते ये शब ही ठीक है
    निकला है शब का आख़िरी तारा बहुत ग़लत

    अफ़सोस ऐ 'नबील' ये तुम ने समझ लिया
    दिल को भी जल बुझा सा शरारा बहुत ग़लत

    चेहरा सदाक़तों का हुआ मस्ख़ ऐ 'नबील'
    उस ने बहाएा झूट का धारा बहुत ग़लत
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    Nabeel Ahmad Nabeel
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    सौ उलझनों के बीच गुज़ारा गया मुझे
    जब भी तिरी तलब में सँवारा गया मुझे

    कम हो सका न फिर भी मिरा मर्तबा अगर
    पस्ती में आसमाँ से उतारा गया मुझे

    सुलझी न एक बार कहीं ज़ुल्फ़-ए-ज़िंदगी
    गरचे हज़ार बार सँवारा गया मुझे

    अपने मफ़ाद के लिए मैदान-ए-जंग में
    जीता गया कभी कभी हारा गया मुझे

    धोया गया बदन मिरा अश्कों के आब से
    मेरे लहू के साथ निखारा गया मुझे

    फिर भी रवाँ-दवाँ हूँ मैं मौज-ए-हयात में
    सौ बार गरचे दहर में मारा गया मुझे

    रख कर चलूँगा जान हथेली पे मैं 'नबील'
    मक़्तल से जिस घड़ी भी पुकारा गया मुझे
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    Nabeel Ahmad Nabeel
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    तेरी तलाश तेरी तमन्ना तो मैं भी हूँ
    जैसा तिरा ख़याल है वैसा तो मैं भी हूँ

    ता'मीर जैसी चाहिए वैसी न हो सकी
    बुनियाद अपनी रोज़ उठाता तो मैं भी हूँ

    बोसीदा छाल पेड़ से लिपटी है गर तो क्या
    अच्छे दिनों की आस पे ज़िंदा तो मैं भी हूँ

    ऐ ज़िंदगी मुझे तो ख़बर तक न हो सकी
    हर-चंद अपने ग़म का मुदावा तो मैं भी हूँ

    महरूमी-ए-हयात का मुझ को भी ग़म तो है
    महरूमी-ए-हयात पे रोता तो मैं भी हूँ

    शायद निकल ही आए यहाँ कोई रास्ता
    इस शहर-ए-बे-लिहाज़ में ठहरा तो मैं भी हूँ

    ऐ ज़िंदगी तो किस लिए मायूस मुझ से है
    तेरी तवक़्क़ुआत पे पूरा तो मैं भी हूँ

    नोक-ए-क़लम पे सूरत-ए-इज़हार ये भी है
    तुझ को ग़ज़ल के रूप में लिखता तो मैं भी हूँ

    ऐ ज़िंदगी तू थामती मेरे वजूद को
    तेरे लिए जहान में भटका तो मैं भी हूँ

    ऐ काश जान ले तू मिरे दिल की दास्ताँ
    तुम हो तो ज़िंदगी का तक़ाज़ा तो मैं भी हूँ

    मुझ में जो इज़्तिराब है मेरे सबब से है
    मुझ से न कुछ कहो कि समझता तो मैं भी हूँ

    ये क्या कि ख़्वाहिशों का सफ़र ख़त्म ही न हो
    ये क्या कि एक मोड़ पे ठहरा तो मैं भी हूँ

    ये क्या कि एक तौर से गुज़रेगी ज़िंदगी
    ये क्या कि एक राह पे चलता तो मैं भी हूँ

    रखता नहीं हूँ दिल में हवाओं का कुछ भी ख़ौफ़
    राहों में तेरी दीप जलाता तो मैं भी हूँ

    तुम आए और समेट के दुनिया निकल गए
    इस उम्र के सराब में भटका तो मैं भी हूँ

    मैं भी दुखों से मावरा कब हूँ जहान में
    बार-ए-ग़म-ए-हयात उठाता तो मैं भी हूँ

    मैं भी भटक रहा हूँ ज़माने के साथ साथ
    अंधा अगर जहान है अंधा तो मैं भी हूँ

    तेरे बयान में है न मेरे बयान में
    इस ज़िंदगी को देख दिखाता तो मैं भी हूँ

    कुछ रौशनी की आस है मुझ को भी ऐ 'नबील'
    आँखों के दीप रोज़ जलाता तो मैं भी हूँ

    हँसती है मुझ पे दुनिया तो हँसती रहे 'नबील'
    इस के मुआ'मलात पे हँसता तो मैं भी हूँ

    रुक से गए 'नबील' ये किस के ख़याल में
    तू देख ग़ौर से मुझे रुकता तो मैं भी हूँ
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    Nabeel Ahmad Nabeel
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    जो नक़्श मिट चुका है बनाना तो है नहीं
    उजड़ा दयार हम ने बसाना तो है नहीं

    आँखों के दीप राह में उस के जलाएँ क्या
    इस ने पलट के फिर कभी आना तो है नहीं

    लाज़िम है चलना ज़ीस्त की राहों पे भी मगर
    जो गिर पड़े किसी ने उठाना तो है नहीं

    भर जाएगा ये थोड़ी सी चारागरी के बा'द
    ताज़ा लगा है ज़ख़्म पुराना तो है नहीं

    कब तक वफ़ा के मअ'नी बताता रहूँ उसे
    उस बे-वफ़ा ने राह पे आना तो है नहीं

    कुछ देर ठहर जाए वो ख़ुद ही ख़ुदा करे
    इस बार कोई ऐसा बहाना तो है नहीं

    फिर ख़्वाहिशों के पेड़ पे बैठेंगे देखना
    इन पंछियों का कोई ठिकाना तो है नहीं

    अल्लाह-रे वफ़ाएँ ये ख़ूबान-ए-शहर की
    मंज़र धुआँ धुआँ है सुहाना तो है नहीं

    मंसूब कर दूँ मैं जो तिरी ज़िंदगी के साथ
    यादों का मेरे पास ख़ज़ाना तो है नहीं

    क्यूँ फिर किसी के दिल में मोहब्बत बसाएँ हम
    जब आशिक़ी में नाम कमाना तो है नहीं

    क़िस्मत है इस के सामने बन जाए कोई बात
    वैसे कोई भी बात बनाना तो है नहीं

    सोचूँ तो सारे लोग निशाने पे हैं मगर
    देखूँ कोई किसी का निशाना तो है नहीं

    वो अपना दर्द आप सुनाए तो बात है
    हम ने किसी का दर्द सुनाना तो है नहीं

    इक दूसरे की घात में बैठे हैं सब मगर
    इस वक़्त ने किसी को बचाना तो है नहीं

    है ताइरान-ए-शौक़ का मस्लक तो ख़ामुशी
    है मस्लहत कि शोर मचाना तो है नहीं
    इश्क़-ओ-नज़र का दाइमी रिश्ता अज़ल से है
    मजनूँ ने शहर छोड़ के जाना तो है नहीं

    हासिल किया न इस लिए ता'मीर का हुनर
    हम ने नया जहान बसाना तो है नहीं

    कैसे रसाई हो मिरी उस के मिज़ाज तक
    अहवाल उस ने दिल का सुनाना तो है नहीं

    महरूम हम न हों कभी माँ की दु'आओं से
    नायाब ऐसा कोई ख़ज़ाना तो है नहीं

    देखेगा कौन चाक-ए-गरेबाँ को 'नबील'
    फ़रहाद-ओ-क़ैस का ये ज़माना तो है नहीं
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    Nabeel Ahmad Nabeel
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    तेरी ख़्वाहिश न जब ज़ियादा थी
    ज़िंदगी जैसे बे-लिबादा थी

    इस लिए मुझ को मिल गई मंज़िल
    मेरी ख़्वाहिश मिरा इरादा थी

    एक तितली जले परों वाली
    बस वही मेरा ख़ान
    वा'दा थी

    मैं ने देखा है वो नगर भी जहाँ
    रौशनी कम नज़र ज़ियादा थी

    चल के इक उम्र मुझ पे राज़ खुला
    मेरी मंज़िल ही मेरा जादा थी

    जिस में रहते थे सब मोहब्बत से
    वो हवेली भी क्या कुशादा थी

    दूर था इस लिए महाज़ से मैं
    फ़ौज मेरी कि पा-पियादा थी

    संग था या कि रास्ते में 'नबील'
    कोई दीवार ईस्तादा थी
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    Nabeel Ahmad Nabeel
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    चारों जानिब पागल-ख़ाने लगते हैं
    मौसम ऐसे होश उड़ाने लगते हैं

    मलबा गिरने लगता है सब कमरे का
    जब तेरी तस्वीर जलाने लगते हैं

    घबरा के इस दौर के वहशी इंसाँ से
    दीवारों को राज़ बताने लगते हैं

    आँख उठा कर जब भी देखूँ पेड़ों को
    मुझ को मेरे दोस्त पुराने लगते हैं

    ज़ेहन में माज़ी जब भी घूमने लगता है
    आँख में कितने आँसू आने लगते हैं

    दिल के हाथों हो के हम मजबूर सदा
    अरमानों की लाश उठाने लगते हैं

    पत्थर जैसी दुनिया है ख़ुद-ग़र्ज़ी है
    उस को क्यूँ कर दर्द सुनाने लगते हैं

    साथ मिरे वो मिल कर चाँद सितारे भी
    हिज्र में तेरे नीर बहाने लगते हैं

    यार 'नबील' उन्हें मैं जितना भूलता हूँ
    मुझ को याद वो उतना आने लगते हैं
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Abbas TabishAbbas TabishDagh DehlviDagh DehlviAhsan MarahraviAhsan MarahraviIdris BabarIdris BabarBano Tahira SayeedBano Tahira SayeedHafeez BanarasiHafeez BanarasiAhmad Nadeem QasmiAhmad Nadeem QasmiVineet AashnaVineet AashnaMuzdum KhanMuzdum KhanVipul KumarVipul Kumar