ज़ाहिद तेरे ख़याल में किस ने ख़लल है दी
बाक़ी रहा ये दिल में कही बस मलाल है
बाक़ी रहा ये दिल में कही बस मलाल है
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मेरे अपने सभी ज़ख़्म भरने लगे
इश्क़ में किस क़दर हम उभरने लगे
इश्क़ में किस क़दर हम उभरने लगे
याद तेरी जुनूँ में जब आती रही
ख़ाक बन कर फ़ज़ा में बिखरने लगे
मैं ने देखा मुहब्बत में मजनूँ भी फिर
ख़्वाब की बंदगी में निखरने लगे
जब से माँ ने कभी हाथ अपना रखा
हादसे पास आ कर ठहरने लगे
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मैं ही था पागल कहीं ख़ुद मेरे ही इमकान से
तोड़ जाता दिल मेरा ही कितने इत्मीनान से
तोड़ जाता दिल मेरा ही कितने इत्मीनान से
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रास्ते को सभी कर के ज़ीशान तू
नूर का ही कही फिर था पैमान तू
नूर का ही कही फिर था पैमान तू
मेरा अपना गिरेबान तो चाक है
दिल की बस्ती का ख़ाली सा मीज़ान तू
मेरे हालात से मुत्मइन हैं सभी
मेरे किरदार से अब है अंजान तू
मैं तो साहिल से फिर लौट कर भी कहीं
उजड़ी कश्ती का ही फिर है सामान तू
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