सोज़-ओ-गुदाज़-ओ-जज़्ब-ओ-असर कौन ले गया
हम से मता-ए-दर्द-ए-जिगर कौन ले गया
हम से मता-ए-दर्द-ए-जिगर कौन ले गया
क्या हो गया है गर्दिश-ए-दौराँ तू ही बता
हुस्न-ओ-जमाल-ए-शाम-ओ-सहर कौन ले गया
शोरीदगी-ए-इश्क़ की लज़्ज़त कहाँ गई
सौदा था जिस में तेरा वो सर कौन ले गया
मंज़िल की सम्त बढ़ते नहीं किस लिए क़दम
ऐ दिल मताअ'-ए-अज़्म-ए-सफ़र कौन ले गया
दिन में हरीम-ए-नाज़ के जल्वे थे सब निहाँ
शब में रिदा-ए-नज्म-ओ-क़मर कौन ले गया
चर्चे थे इल्म-ओ-फ़ज़्ल के दुनिया-जहान में
गंजीना-हा-ए-इल्म-ओ-हुनर कौन ले गया
जिबरील के भी जलते हैं पर जिस जगह 'हबाब'
उस जा पे ख़ाक-ए-पा-ए-बशर कौन ले गया
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ख़ुद पे वो फ़ख़्र-कुनाँ कैसा है
उस को अपने पे गुमाँ कैसा है
उस को अपने पे गुमाँ कैसा है
कोई जुम्बिश है न आहट न सदा
ये जहान-ए-गुज़राँ कैसा है
दिल धड़कने की भी आवाज़ नहीं
सानेहा काहिश-ए-जाँ कैसा है
आज तक ज़ख़्म हरे हैं दिल के
मरहम-ए-चारा-गराँ कैसा है
उस से नज़दीक नहीं है कोई
वो क़रीब-ए-रग-ए-जाँ कैसा है
गुल खुला ही गई लैला-ए-बहार
शोर-ए-आशुफ़्ता-सराँ कैसा है
हम कड़ी धूप के आदी थे 'हबाब'
सर पे ये अब्र-ए-रवाँ कैसा है
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अब तलक तुंद हवाओं का असर बाक़ी है
इक चराग़ और सर-ए-राहगुज़र बाक़ी है
इक चराग़ और सर-ए-राहगुज़र बाक़ी है
वो हमारी नहीं सुनता तो गिला है कैसा
अब कहाँ अपनी दु'आओं में असर बाक़ी है
दिल में बाक़ी हैं फ़क़त चंद लहू के क़तरे
अब मिरे पास यही ज़ाद-ए-सफ़र बाक़ी है
फिर बना लेंगे उसी जा पे नशेमन अपना
आशियाँ जिस पे था वो शाख़-ए-शजर बाक़ी है
मासियत अश्क नदामत से भी धुल जाती है
मुतमइन हूँ कि अभी दीदा-ए-तर बाक़ी है
जब वो चाहे मुझे दो-नीम करे आ के 'हबाब'
दस्त-ए-क़ातिल में यही एक हुनर बाक़ी है
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कभी हमारे लिए तेग़-ए-बे-नियाम करो
जो दास्ताँ है तुम्हारी उसे तमाम करो
जो दास्ताँ है तुम्हारी उसे तमाम करो
ख़ुलूस और मोहब्बत से नेक काम करो
ये मय-कदे है सभी को शरीक-ए-जाम करो
जो मय-कदे से निकाले गए तो क्या होगा
मैं मोहतसिब हूँ यहाँ मेरा एहतिराम करो
तुम्हारे क़ुर्ब से दिल को सुकून मिलता है
मिरे क़रीब ही बैठो न कुछ कलाम करो
वो एक शाम कि जिस पर निसार सुब्ह-ए-अज़ल
वो एक शाम कभी तुम हमारे नाम करो
कहाँ नजात की सूरत है क़ैद-ए-हस्ती से
किसी तरह इसी ज़िंदाँ में सुब्ह-ओ-शाम करो
'हबाब' हस्ती-ए-मौहूम का भरोसा क्या
मुसाफ़िरों की तरह बस यहाँ क़याम करो
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हद-ए-जुनूँ से भी आगे गए हैं दीवाने
मिलेगी मंज़िल-ए-मक़्सूद कब ख़ुदा जाने
मिलेगी मंज़िल-ए-मक़्सूद कब ख़ुदा जाने
किए हैं तू ने मुनव्वर दिलों के काशाने
तिरे वजूद से आबाद हैं सनम-ख़ाने
जो तुम न थे तो बहारें ख़िज़ाँ से बद-तर थीं
तुम आ गए तो चमन बन गए ये वीराने
शब-ए-फ़िराक़ हुजूम-ए-ग़म-ओ-अलम के तुफ़ैल
तुम्हारी याद चली आई दिल को बहलाने
तमाम उम्र रही यूँ ही चाक-दामानी
चले हैं अहल-ए-ख़िरद आज मुझ को समझाने
'हबाब' अश्क-ए-नदामत हैं उन की आँखों में
क़ुबूल कीजे ख़ुलूस-ओ-वफ़ा के नज़राने
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