अपना दुखड़ा कहते हैं
और तुझे क्या कहते हैं
और तुझे क्या कहते हैं
कच्ची कोंपल होता है
प्यार का रिश्ता कहते हैं
दुनिया किस की अपनी है
अहल-ए-दुनिया कहते हैं
ऐ दिल ये दर-मांदगियाँ
तुझ को दरिया कहते हैं
अपना सा बस लगता है
जिस को अपना कहते हैं
लूटने वाले! देर न कर
लूट के ले जा कहते हैं
'गौहर' लोग तो बात नहीं
बात का सेहरा कहते हैं
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दरिया में ये नाव किस तरफ़ है
पानी का बहाव किस तरफ़ है
पानी का बहाव किस तरफ़ है
ये राह किधर को मुड़ रही है
लोगों का लगाव किस तरफ़ है
मंज़िल कहाँ ताकते हैं राही
तकते हैं पड़ाव किस तरफ़ है
तासीर कहाँ गई सुख़न से
जज़्बों का अलाव किस तरफ़ है
आवाज़ कहीं बुला रही है
यारों का रिझाव किस तरफ़ है
तस्वीर दिखा रही है क्या कुछ
रंगों का रचाओ किस तरफ़ है
खोए हुए तुम कहाँ हो 'गौहर'
दिल का ये खिंचाव किस तरफ़ है
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मरहला तय कोई बे-मिन्नत-ए-जादा भी तो हो
ग़म बढ़े भी तो सही दर्द ज़ियादा भी तो हो
ग़म बढ़े भी तो सही दर्द ज़ियादा भी तो हो
ऐसी मुश्किल तो नहीं दश्त-ए-वफ़ा की तस्ख़ीर
सर में सौदा भी तो हो दिल में इरादा भी तो हो
ज़ेहन का मश्वरा-ए-तर्क-ए-तलब भी बर-हक़
ज़ेहन की बात क़ुबूल-ए-दिल-ए-सादा भी तो हो
कहीं बादल कहीं सूरज कहीं साया कहीं धूप
मिरे माबूद तिरा कोई लबादा भी तो हो
प्यार में कम तो नहीं कम-निगही भी उस की
हाँ तुनक-ज़र्फ़ी-ए-एहसास कुशादा भी तो हो
आशिक़ी सरमद-ओ-मंसूर से कुछ ख़ास नहीं
मस्त लेकिन कोई बे-ज़हमत-ए-बादा भी तो हो
ज़र्फ़-ए-ईज़ा-तलबी ग़म भी परख लें 'गौहर'
उस से इक रोज़ न मिलने का इरादा भी तो हो
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दुखी दिलों में, दुखी साथियों में रहते थे
ये और बात कि हम मुस्कुरा भी लेते थे
ये और बात कि हम मुस्कुरा भी लेते थे
वो एक शख़्स बुराई पे तुल गया तो चलो
सवाल ये है कि हम भी कहाँ फ़रिश्ते थे
और अब न आँख न आँसू न धड़कनें दिल में
तुम्हीं कहो कि ये दरिया कभी उतरते थे
जुदाइयों की घड़ी नक़्श नक़्श बोलती है
वो बर्फ़-बार हवा थी, वो दाँत बजते थे
अब इन की गूँज यहाँ तक सुनाई देती है
वो क़हक़हे जो तिरी अंजुमन में लगते थे
वो एक दिन कि मोहब्बत का दिन कहें जिस को
कि आग थी न तपिश बस सुलगते जाते थे
कहाँ वो ज़ब्त के दा'वे कहाँ ये हम 'गौहर'
कि टूटते थे न फिर टूट कर बिखरते थे
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