गले लग कर मिरे वो जाने हँसता था कि रोता था
न खुल कर धूप फैली थी न बादल खुल के बरसा था
न खुल कर धूप फैली थी न बादल खुल के बरसा था
कभी दिल भी नहीं इक ज़ख़्म आँखों की जगह आँसू
कभी मैं भी न था बस डाइरी में शे'र लिक्खा था
वो हर पल साथ है मेरे कहाँ तक उस को मैं देखूँ
गए वो दिन कि उस के नाम पर भी दिल धड़कता था
यहाँ हर कश्ती-ए-जाँ पर कई माँझी मुक़र्रर थे
उधर साज़िश थी पानी की इधर क़ज़िया हवा का था
छुपा कर ले गया अपने दुखों को सारी दुनिया से
लगा था यूँ तो हम तुम सा वो जादूगर बला का था
10
0 Likes
9
0 Likes
हँसने में रोने की आदत कभी ऐसी तो न थी
तेरी शोख़ी ग़म-ए-फ़ुर्क़त कभी ऐसी तो न थी
तेरी शोख़ी ग़म-ए-फ़ुर्क़त कभी ऐसी तो न थी
अश्क आ जाएँ तो पलकों पे बिठाऊंगा उन्हें
क़तरा-ए-ख़ूँ तिरी इज़्ज़त कभी ऐसी तो न थी
किश्त-ए-ग़म और भी लहराने लगी हँसने लगी
चश्म-ए-नम तेरी शरारत कभी ऐसी तो न थी
कितने ग़म भूल गया शुक्रिया तेरा ग़म-ए-यार
यूँ मुझे तेरी ज़रूरत कभी ऐसी तो न थी
वो मुजस्सम भी जो आ जाए तो देखूँ न उसे
मेरी उस बुत की इबादत कभी ऐसी तो न थी
देर तक बैठे प कुछ तू ने न मैं ने ही कहा
जैसी तुझ से है रिफ़ाक़त कभी ऐसी तो न थी
एक इक शे'र से टपके हैं लहू के क़तरे
मेरी दुश्मन ये तबीअ'त कभी ऐसी तो न थी
8
0 Likes
7
0 Likes
था वो जंगल कि नगर याद नहीं
क्या थी वो राह-गुज़र याद नहीं
क्या थी वो राह-गुज़र याद नहीं
ये ख़याल आता है मैं ख़ुश था बहुत
किस तरफ़ था मिरा घर याद नहीं
क्या थी वो शक्ल पे भोली थी बहुत
प्यारा सा नाम था पर याद नहीं
ज़ख़्मों के फूल हैं दिल में अब भी
किस ने बख़्शे थे मगर याद नहीं
इक घनी छाँव में दिन बीता है
शब कहाँ की थी बसर याद नहीं
एक लम्हा तो धड़कता है ज़रूर
कई सदियों का सफ़र याद नहीं
ताक़ थे दास्ताँ कहने में 'उबैद'
अब ब-जुज़ दीदा-ए-तर याद नहीं
6
0 Likes
5
0 Likes
4
0 Likes
ग़म भी उतना नहीं कि तुम से कहें
और चारा नहीं कि तुम से कहें
और चारा नहीं कि तुम से कहें
आज हम बे-कराँ समुंदर हैं
तुम वो दरिया नहीं कि तुम से कहें
यूँ तो मरने से चैन मिलता है
ये इरादा नहीं कि तुम से कहें
नीली आँखों की चाँदनी के लिए
अब अँधेरा नहीं कि तुम से कहें
तुम अकेले नहीं रहे तो क्या
हम भी तन्हा नहीं कि तुम से कहें
अब न वो ग़म कि अपने हाथ 'उबैद'
शबनम-आसा नहीं कि तुम से कहें
3
0 Likes
2
0 Likes
अभी तमाम आइनों में ज़र्रा ज़र्रा आब है
ये किस ने तुम से कह दिया कि ज़िंदगी ख़राब है
ये किस ने तुम से कह दिया कि ज़िंदगी ख़राब है
न जाने आज हम पे प्यास का ये कैसा क़हर है
कि जिस तरफ़ भी देखिए सराब ही सराब है
हर एक राह में मिटे मय-ए-नुक़ूश-ए-आरज़ू
हर इक तरफ़ थकी थकी सी रहगुज़ार ख़्वाब है
कभी न दिल के सागरों में तुम उतर सके मगर
मिरे लिए मिरा वजूद इक खुली किताब है
हर एक सम्त रेत रेत पर हवा के नक़्श हैं
यहाँ तो दश्त दश्त में हवाओं का अज़ाब है
1
0 Likes









